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राजस्थान: एशिया के सबसे बड़े कच्चे डैम से अरबों लीटर पानी बहा व्यर्थ, 9KM का प्रोजेक्ट बदल सकता है 40 गांवों की तस्वीर

Morel Dam Overflow: मोरेल नदी पर बना एशिया का सबसे बड़ा कच्चा डैम मोरेल बांध बीते दो वर्षों में मानसून की मेहरबानी से अपनी क्षमता से कई गुना अधिक भरकर लगातार ओवरफ्लो हो रहा है।
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दौसा

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Anil Prajapat

Jun 29, 2026

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मोरेल बांध से बहता पानी। पत्रिका फाइल फोटो

दौसा। लालसोट उपखंड क्षेत्र स्थित कांकरिया गांव में मोरेल नदी पर बना एशिया का सबसे बड़ा कच्चा डैम मोरेल बांध बीते दो वर्षों में मानसून की मेहरबानी से अपनी क्षमता से कई गुना अधिक भरकर लगातार ओवरफ्लो हो रहा है, वहीं जिम्मेदार अफसरों व जनप्रतिनिधियों के पास योजना नहीं होने के कारण पड़ौस के प्यास सूखे पड़े है। वर्ष 2024 एवं 2025 में रिकॉर्ड बारिश के चलते दोनों वर्षों में बांध लबालब भरने के बाद भी इसमें अरबों लीटर अतिरिक्त पानी पहुंचा।

दोनों वर्षों में बांध में भराव क्षमता से इतना अधिक पानी आया कि एशिया का यह सबसे बड़ा कच्चा बांध एक-दो बार नहीं, बल्कि 8 बार और पूरा भर सकता था। लेकिन जल संरक्षण की दूरदर्शी योजना के अभाव में यह बहुमूल्य जल ओवरफ्लो होकर मोरेल, बनास और चंबल नदी के रास्ते समुद्र में चला गया। दूसरी ओर इस बांध से कुछ ही किलोमीटर दूर स्थित दौसा जिले के राहुवास, दक्षिण बिनोरी सागर और खारली जैसे बांध एक-एक बूंद पानी के लिए तरसते रहे और खाली पड़े हैं। इन बांधों के खाली रहने से आसपास के सैकड़ों गांवों में भूजल स्तर लगातार गिरता गया। कई क्षेत्रों में किसानों को सिंचाई के लिए गहरे बोरवेल पर निर्भर रहना पड़ा, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट भी समय-समय पर गंभीर रूप धारण करता रहा।

2025 में पांच गुना पानी बह गया

जल संसाधन विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में रिकॉर्ड बारिश के बाद मोरेल बांध में लगभग 8000 मिलियन घन फीट पानी पहुंचा, जो इसकी कुल क्षमता से लगभग तीन गुना अधिक था। इसके बाद वर्ष 2025 में स्थिति और भी असाधारण रही, जब बांध में करीब 12 हजार मिलियन घन फीट पानी की आवक दर्ज की गई, जो इसकी क्षमता से करीब 5 गुना अधिक थी। दोनों वर्षों में हजारों मिलियन घन फीट पानी ओवरफ्लो होकर बह गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस अतिरिक्त जल का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण किया जाता तो पूरे क्षेत्र की जल समस्या का स्थायी समाधान संभव था।

एक्सपर्ट व्यू: लिफ्ट परियोजना बने तो बदल सकती है तस्वीर

यदि मोरेल बांध के इसी अतिरिक्त (सरप्लस) पानी को आधुनिक लिफ्ट सिंचाई तकनीक से सूखे बांधों में स्थानांतरित कर दिया जाए, तो क्षेत्र में पानी की अभूतपूर्व क्रांति आ सकती है। मोरेल बांध के ओवरफ्लो पानी को लिफ्ट परियोजना के माध्यम से राहुवास, दक्षिण बिनोरी सागर और खारली बांधों तक पहुंचाया जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार होगा। इन बांधों में पानी भरने से आसपास के क्षेत्रों में भूजल का प्राकृतिक पुनर्भरण होगा और सूखते कुएं, ट्यूबवेल तथा हैंडपंप फिर से जीवंत हो सकेंगे।

मोरेल बांध के ओवरफ्लो पानी को लिफ्ट कर मात्र 9 किलोमीटर दूर स्थित दक्षिण सागर बांध में डाला जाए तो इस योजना से लालसोट विधानसभा क्षेत्र के लगभग 40 गांवों का भूजल स्तर ऊपर आएगा। पेयजल संकट का स्थायी समाधान होगा तथा क्षेत्र के किसानों की 1660 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई के लिए प्रचुर मात्रा में पानी मिल सकेगा।

इनका कहना है

दक्षिण सागर और सिंथोली बांध आपस में जुड़े हैं। इस पानी से दक्षिण बिनोरी सागर के डाउन स्ट्रीम में स्थित डिवाचली बांध और पीपलाई बांध भी स्वतः ही भर जाएंगे तथा बामनवास विधानसभा क्षेत्र के लगभग 30 गांवों का जलस्तर भी बढ़ेगा। जल भंडारण क्षमता बढ़ने से भविष्य में कम वर्षा की स्थिति में भी क्षेत्र सुरक्षित रह सकेगा।
-बीएम मीना, सेवानिवृत्त आईएएस