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मौत पर इस गांव में मातम नहीं जश्न मनाते हैं लोग, नाच-गाकर आत्मा को देते हैं विदाई

दशगात्र व तेरहवीं पर होते हैं सांस्कृतिक कार्यक्रम

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People do not celebrate mourning in this village on death, give farewell to the soul by dancing and singing

People do not celebrate mourning in this village on death, give farewell to the soul by dancing and singing

डिंडोरी/गाड़ासरई. क्षेत्र में आज भी वर्षो पुरानी परंपरा चली आ रही है। यहां लोगों की मौत पर मातम नहीं मनाया जाता। दशगात्र और तेरहवीं पर मातम की जगह सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। इस मौके पर नाचने गाने वालों को दूर-दूर से बुलाया जाता है। दशगात्र की रात एक तरफ जहां सामूहिक भोज चल रहा होता है, वहीं दूसरी तरफ नाच गाने का कार्यक्रम चलता है। कार्यक्रम को देखने पूरा गांव एकत्रित हो जाता है। इस परंपरा की लोग मिसाल देते हैं। ऐसा ही कार्यक्रम गाड़ासरई के एक मांझी परिवार में देखने को मिला। गाड़ासरई के अतरिया मोहल्ले में कुछ दिन पहले विनोद मांझी की हृदयघात से मृत्यु हो गई, जिसका रविवार की रात दशगात्र का कार्यक्रम रखा गया था। मृतक के परिवार व रिश्तेदार सहित भारी संख्या में लोग एकत्रित हुए और कार्यक्रम का आयोजन किया।
पुण्य आत्मा को खुशी-खुशी करते हैं विदा
इस परंपरा से जुड़े लोगों का मानना है कि जिस प्रकार बच्चे के जन्म होने पर परिवार खुशियां मनाता है। वैसे ही किसी व्यक्ति की मृत्यु पर पुण्य आत्मा को खुशी-खुशी विदा करते हैं। उसके जाने की शोक संवेदना नहीं करते। मृतक परिवार के लोगों का कहना है कि हम रोकर या अपना दुख दिखाकर जाने वाले की आत्मा को दुखी नहीं करना चाहते और वैसा ही आयोजन करते हैं, जैसे उसके आने पर किया गया था। परिवार वालों का कहना था कि इससे दिवंगत आत्मा को अपने परिवार को हंसते गाते देखकर शांति मिल मिलती है इसलिए इस तरह के आयोजन किए जाते हैं।