
श्रीठाकुरजी मंदिर वणियाप
Krishna Janmashtami : वागड़ की पवित्र धरा में कई ऐतिहासिक धरोहरों को सहेजे हुए है। यहां कण-कण में शिव-शक्ति और वासुदेव के मंदिर अवस्थित हैं। इन्हीं में से एक है गलियाकोट उपखंड क्षेत्र में स्थित वणियाप गांव में वागड़ के परमार शासकों द्वारा 12वीं शताब्दी में नागर शैली अंर्तगत निर्मित श्रीठाकुरजी मंदिर। ठाकुरजी मंदिर का गौरवशाली इतिहास रहा है। मंदिर में तत्कालीन समय के दो शिलालेख हैं। वहीं, अन्य उपलब्ध साक्ष्यों से भी मंदिर के इतिहास के बारे में रोचक तथ्य सामने आते हैं। मंदिर के निर्माण के साथ ही यहां गर्भ गृह में दशावतार भगवान विष्णु की एक विशालकाय मूर्ति स्थापित थी। पर, कालांतर में 17-18वीं शताब्दी में मुगल आक्रांता औरंगजेब द्वारा इस मंदिर एवं मंदिर की मोहिनी प्रतिमा को खंडित कर दिया। इसके बाद क्षेत्रवासियों ने खंडित प्रतिमा को मंदिर में संरक्षित करते हुए गर्भ गृह में नवीन प्रतिमा विराजित की। बाद में समय-समय पर मंदिर का जीर्णोद्धार श्रद्धालुओं ने करवाया। वर्ष 2008 में भी ग्रामवासियों ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाकर निर्माण कार्य करवाया। वहीं, मंदिर में रखी खंडित प्रतिमा को डूंगरपुर स्थित राजमाता देवेंद्रकुंवर राजकीय संग्रहालय में संरक्षित करवाई।
गांव के लोगों की मंदिर के प्रति इस कदर है कि ठाकुरजी मंदिर के लिए गांव के लिए कई श्रद्धालुओं ने अपनी बेशकीमती जमीन भी दान देने में देर नहीं की। वर्ष 2021 में मदिर के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ सौन्दर्यकरण के लिए स्व. अमरजी पाटीदार एवं स्व. राघवजी पाटीदार ने मंदिर से सटी भूमि भेंट की। इससे चारदीवारी, उद्यान आदि बने। इसके बाद अन्य श्रद्धालुओं ने भी भू-दान किया। यहां अन्य भी विकास कार्य जारी है।
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मंदिर में जन्माष्टमी पर मंदिर कमेटी द्वारा दो से तीन दिन तक विशेष आयोजन होते हैं। इसमें विशेषकर भगवान कृष्ण का शृंगार दर्शन, छप्पन भोग, बाल-गोपाल दर्शन, भजन-संध्या, दही-हाण्डी, प्रसाद-वितरण व मंदिर प्रांगण की विशेष साज-सज्जा अंत्यन्त आकर्षक रहती है। वणियाप स्थित मंदिर डूंगरपुर जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर है। सागवाड़ा से गोरेश्वर मार्ग होते हुए 12 किलोमीटर एवं गलियाकोट उपखंड से चार किलोमीटर की दूरी पर है। मंदिर के आसपास क्षेत्र में क्षेत्रपाल मंदिर, शीतला माता मंदिर, नदियों से घिरा वांदरवेड़ शिवालय, गौरेश्वर शिवालय आदि तीर्थ स्थल हैं।
मंदिर के बारे किवंदति है कि मंदिर का निर्माण प्राचीन समय में वहां के निवासी जैनों ने करवाया था। जैनों को वागड़ी में ‘वाणीया’ भी कहां जाता है। इससे ही गांव का नाम वणियाप पड़ा। मंदिर में अंत्यन्त सुंदर, आकर्षक व मनमोहक प्रतिमा होने के साथ ही यह जनास्था का अगाध केन्द्र हैं। यहां नियमित पूजा-अर्चना के साथ ही श्रावण, अधिकमास एवं जन्माष्टमी पर विविध धार्मिक अनुष्ठान होते हैं।
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Published on:
26 Aug 2024 07:10 pm
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