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मोटिवेशन : इन्होंने बेटियों को दी घर में शिक्षा

मुंबई की सुप्रिया जोशी मालविका और राधा की मां हैं। उन्हें अपनी बेटियों से सिर्फ एक ही अपेक्षा थी कि वे जो भी कॅरियर चुनें, बस खुश रहें।

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Amanpreet Kaur

May 17, 2018

Supriya Joshi

मुंबई की सुप्रिया जोशी मालविका और राधा की मां हैं। उन्हें अपनी बेटियों से सिर्फ एक ही अपेक्षा थी कि वे जो भी कॅरियर चुनें, बस खुश रहें। टेड टॉक, इंडिया का हिस्सा रह चुकी सुप्रिया अपनी कहानी सुना रही हैं... आज मैं एक आत्मविश्वासी महिला हूं। लेकिन जीवन में एक क्षण था जब मुझमें आत्मविश्वास की कमी थी। मैं खुश भी नहीं रहती थी। मैं एक कमजोर, आलसी व नाकारा छात्रा थी। मेरे परिवार के सदस्य काफी पढ़े-लिखें थे, उन्हें लगता था कि मैं भी उनकी तरह पढूं, कुछ बनूं। इसी वजह से मैंने मास्टर्स इन कंप्यूटर एप्लीकेशन में प्रवेश लिया, लेकिन मैं अक्सर क्लास में न जाकर लाइब्रेरी में बैठने लगी। उन्हीं दिनों बाल विकास की किताबें पढ़-पढक़र मेरी रुचि इस विषय में हुई। डिग्री हासिल करने के बाद मेरी जॉब करने की कोई इच्छा नहीं थी। तब मैंने अपना आत्मविश्वास खो दिया था। फिर मेरी शादी हो गई और मैं अपने परिवार की खुशियों में खो गई।

Supriya Joshi

कुछ ही दिनों में मेरी खुशियां कम होने लगी और मैं डिप्रेशन में चली गई। मैंने दो बेटियों को जन्म दिया। मेरे परिवार के लिए यह खुशी का मौका था, लेकिन मेरे लिए मुश्किल समय था। मैं अच्छी मां बनना चाहती थी, लेकिन एक समय यह आया कि मैं उनकी देखभाल करने में पूरी तरह असमर्थ हो गई। डॉक्टर के नियमित उपचार और बीमारी के साथ लंबे संघर्ष करने के बाद मैं इससे बाहर आ पाई। फिर समझ में आया कि जिंदगी में खुशी की अहमियत आखिर क्या है? कितनी कम उम्र में हम कामयाबी का लक्ष्य तय करके बच्चों के हाथों में पढ़ाई-लिखाई थमा देते हैं। तब से खुशियों को नजरअंदाज करके उन्हें सफलता के इस दौड़ में अंधाधुंध भागने की लत लग जाती है।

Supriya Joshi

ऐसे में कामयाब कॅरियर एक बार बन भी जाएं तो भी खुशियां नसीब नहीं होती। कामयाबी हासिल करने का यह तरीका मुझे मंजूर नहीं था। क्योंकि पढ़ाई-लिखाई हो या जिंदगी अगर उसमें जिंदादिली नहीं बचेगी तो सब बेमतलब है। इसलिए मैंने अपनी दोनों बेटियों को 12 साल की उम्र में स्कूल छुड़वा दिया। उन्होंने बोर्ड की परीक्षाएं भी नहीं दीं। इस सफर में मैंने काफी कठिनाइयों का सामना किया। मालविका को जब एमआइटी में दाखिला मिला तब सभी ने मेरी तारीफ की। उस वक्त भी लोगों को हमारा प्रयास नहीं सिर्फ एडमिशन नजर आया। आज दोनों कॅरियर बनाने की राह में चल रही हैं बिना किसी उच्च डिग्री के। बच्चों की कामयाबी के यही मंत्र जानने दूसरे माता-पिता मेरे पास आते हैं। उन्हें देख मैं बेबस महसूस करती हूं। मुझे उनकी खुशी का फंडा ही गलत लगता है। उनको मैं कामयाबी का जादू कैसे सिखाऊं? बस इतना जानती हूं कि अगर मुझे खुशियां मिल सकती है तो आपको क्यों नहीं!


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