
Chimney and lanterns were Sahara
प्रधानमन्त्री भले ही दावा करें लेकिन राज्य में कई गांव ऐसे हैं जहां के लोगों ने बिजली अब तक कभी देखी ही नहीं। बाड़मेर और सिरोही के दो गांवों में बच्चे आज भी लालटेन की रोशनी में पढ़ते हैं। उन्हें बिजली के बारे में जानकारी नहीं है।
दिन में ८ किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल आना-जाना और रात को चिमनी में पढ़ाई करना। बाड़मेर में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बसे गांव सरी का पार में रहने वाले बच्चों की यही दिनचर्या है। ग्राम पंचायत रोहिङाला के गांव सरी का पार में लगभग 50 घरों की आबादी के साथ पास में छोटी-छोटी ढाणियां मिलाकर 100 घरों की आबादी है। गांव में अभी तक विद्युतीकरण नहीं हुआ है। सरी का पार गांव में चल रहे प्राथमिक विद्यालय को 4 किमी दूर राउप्रावि रामङोकर में मर्ज कर दिया गया। इससे विद्यार्थियों को 4 किमी दूर स्कूल जाना पड़ता है। बच्चे पैदल ही स्कूल आते-जाते हैं।
बोकी भागली आज भी अंधेरे में
सिरोही जिले के गोयली ग्राम पंचायत की बोकी भागली गांव में आज भी लोग बिजली से अनजान हैं। यहां वन विभाग अपनी भूमि बता रहा है और डिस्कॉम के अधिकारियों का कहना है कि विभाग लिखित में दे तो बिजली दी जा सकती है। दोनों की खींचतान में आदिवासी अंधेरे में जीवन यापन कर रहे हैं। ग्रामीण रामाराम गरासिया ने बताया कि बिजली की समस्या को लेकर जिला कलक्टर, मुख्यमंत्री तथा प्रधानमंत्री तक ज्ञापन भेज दिए, लेकिन अभी कुछ तक कुछ नहीं हुआ है। बोकी भागली में करीब डेढ़ सौ घर आज भी दीपक से रोशन हो रहे हैं।
सरी का पार गांव , बाड़मेर
हमारी भावी पीढ़ी खतरे में है। गांव का स्कूल बंद कर दिया गया। पानी के लिए जलदाय विभाग मनमानी पर उतरा हुआ है। दो माह से मोटर जली हुई है, रिपेयरिंग कर मोटर लगाते हैं तो कुछ दिन चलने के बाद फिर जल जाती है।
रतनलाल सुथार, ग्रामीण
बोकी भागली , सिरोही
एक हैक्टेयर तक जमीन हो तो हम व्यवस्था कर सकते हैं, इससे ज्यादा हो तो केन्द्र सरकार को लिखना पड़ता है। बसावट के डायवर्जन के बाद व्यवस्था हो सकती है। यही चूली भागली में किया था।
संग्रामसिंह कटियार, उपवन संरक्षक, सिरोही
Published on:
09 May 2018 04:15 pm
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