
File Photo of Mayawati Duriing Assembly Elections 2022
UP Assembly Election 2022: लखनऊ. विधानसभा चुनाव को देखते हुए यूपी में सभी दल अपनी-अपनी रणनीति पर काम कर रहे हैं साथ ही कोई रथयात्रा कर रहा है, कोई महिला वोटरों को रिझा रहा है तो कोई टैबलेट और स्मार्टफोन बांट रहा है। मगर इन सब सियासी हलचलों के बीच एक महत्वपूर्ण चेहरा गायब नजर आ रहा है वो है यूपी की चार बार की मुख्यमंत्री रह चुकीं और बसपा सुप्रीमो मायावती का। मायावती आउटडोर की सियासी हलचलों से दूर इनडोर रहकर सिर्फ सोशल मीडिया पर दिख रही हैं, वो भी अपने ट्वीट के ज़रिये। जो अक्सर वो किसी न किसी मुद्दे पर करती रहती हैं। इस बीच मायावती के कई विधायक और बसपा के पुराने कद्दावर नेता उनका साथ छोड़ चुके हैं और गिने-चुने विधायक ही अब उनके साथ हैं। इन सबके बावजूद यह चुप्पी मायावती की रणनीति है या उनकी कोई मजबूरी यह तो वहीं जानें। मगर मायावती की चुप्पी सियासी गलियारे में चर्चा का विषय बनी हुई है।
पार्टी नेताओं की मानें तो मायावती चुनाव की तारीख़ों के एलान के बाद ही प्रचार शुरू करेंगी। उससे पहले वो हर पार्टी की चुनावी रणनीति को परख रही हैं उसी हिसाब से अपनी पार्टी की रणनीति तैयार कर रही हैं। उन्होंने जिले के सभी नेताओं को बूथ स्तर पर तैयारी करने को कहा है।
मायावती की चुप्पी का मतलब!
यूपी की राजनीति को करीब से जानने वालों का कहना है कि मायावती की चुप्पी दरअसल उनकी रणनीति नहीं बल्कि उनकी मजबूरी है। ये मजबूरी है उनकी आय से अधिक संपत्ति के मामले को लेकर सीबीआई और ईडी की लटकती तलवार। यूपी चुनावों को लेकर मायावती ने जो आखिरी जनसभा की थी वो 9 अक्टूबर को काशीराम की पुण्यतिथि के मौके पर लखनऊ के कांशीराम स्मारक स्थल पर की थी। उसके बाद से वो फिर परिदृश्य से गायब हैं।
सतीश मिश्रा के ट्वीट ने बढ़ाई सियासी सरगर्मी
मायावती को लेकर यूपी की सियासत में एक बार फिर उस वक्त सरगर्मी बढ़ गयी जब 29 दिसंबर को बसपा महासचिव सतीश चन्द्र मिश्रा के एक ट्वीट ने मायावती की फोटो को ट्वीट करते हुए लिखा कि, “बहनजी आने वाली हैं।" सतीश चन्द्र मिश्रा के इस ट्वीट को लेकर सियासी जानकारों ने अलग-अलग मायने निकालना शुरू कर दिया है। किसी का कहना है कि इस ट्वीट का मतलब ये है कि मायावती जल्द ही चुनावी रैलियों पर निकलने वाली हैं तो कोई कह रहा है कि मायावती को अब भी भरोसा है कि वो बीजेपी और सपा के मुकाबले मैदान में हैं।
खैर जो भी हो मगर मायावती को नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता है। वजह ये कि मायावती भले ही सत्ता में न हों लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले दो दशकों में बसपा का वोट प्रतिशत कभी भी 20 फीसदी से कम नहीं हुआ है। साथ ही आरक्षित सीटों पर बसपा हमेशा मजबूत पार्टी रही है।
Published on:
31 Dec 2021 07:33 pm
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