
UP Assembly Election Results 2022 : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके है, जनता ने एक बार फिर योगी आदित्यनाथ सरकार पर भरोसा जताया है। गुरुवार को शुरुआती रुझान में सपा-रालोद गठबंधन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ी बढ़त बनाता दिख रहा था, लेकिन अंत में विफलता ही हाथ लगी। जिससे सभी समीकरण फेल हो गए हैं। सूत्रों का कहना है कि सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ किसान आंदोलन के केंद्र बिंदु वाले वेस्ट यूपी में गठबंधन की उम्मीद से कम प्रदर्शन का प्रमुख कारण उम्मीदवारों का गलत चयन और उनकी अदला-बदली रही। सपा ने रालोद के कुछ प्रत्याशियों को 'गोद' लिया और कुछ को अपनी पार्टी का चुनाव चिन्ह आवंटित किया। इससे उन मतदाताओं के मन में भ्रम हो गया, जो सपा के आचरण को पसंद नहीं करते थे।
जाटों ने सिर्फ रालोद के चुनाव चिन्ह पर उतरे उम्मीदवारों को ही वोट दिया। उन्होंने रालोद नेताओं को भी वोट नहीं दिया, जो सपा के चुनाव चिन्ह पर खड़े थे। इसके अलावा मुजफ्फरनगर दंगों की यादों को भी भाजपा ने प्रचार में ताजा किया, जिसने गठबंधन को काफी नुकसान पहुंचाया। जयंत चौधरी के लिए इन चुनावों में दांव ऊंचे थे, क्योंकि उनके पिता अजीत सिंह की मृत्यु के बाद यह उनका पहला चुनाव था। उन पर अधिक से अधिक सीटें जीतकर पार्टी को फिर से पटरी पर लाने की जिम्मेदारी थी। यही कारण है कि चुनावों में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांकि, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने हर चुनावी सभा में मतदाताओं को यह बताने के लिए एक बिंदु बनाया कि वह स्पष्ट रूप से एक कनिष्ठ साथी थे और यह उन लोगों के लिए अच्छा नहीं था जो रालोद के पक्ष में थे।
2002 में किया था सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन
रालोद के चुनावी इतिहास से पता चलता है कि यूपी विधानसभा चुनावों में जीती गई सीटों की संख्या के मामले में उसका अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2002 में था। जब उसने भाजपा के साथ गठबंधन में 38 में से 14 सीटों पर जीत हासिल की थी। चुनाव लड़ी गई सीटों में इसका वोट शेयर भी 2002 में सबसे अधिक 26.82 प्रतिशत था।
2017 में हुई पार्टी की दुर्गति
हालांकि कुल वैध वोटों के मुकाबले वोट शेयर केवल 2.48 प्रतिशत था, जो कि 2007 में पार्टी को मिले 3.70 प्रतिशत वोट शेयर से कम था। चुनाव में जब उसने 254 में से 10 सीटों पर अपने दम पर जीत हासिल की। पार्टी 2017 के विधानसभा चुनावों में अकेले चली गई और बागपत में केवल एक सीट, यानी छपरौली जीतने में सफल रही, लेकिन अकेले विधायक सहेंद्र सिंह रमाला बाद में 2018 में भाजपा में शामिल हो गए।
Published on:
11 Mar 2022 09:55 am
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