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Happy Birthday मनोज बाजपेयी: वो बचपन के ‘बेमेल ब्याह’ का रसगुल्ला ऐसे खाया कि पिता को हो गया डाउट

Manoj Bajpayee Birthday: बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता मनोज बाजपेयी आज अपना 56वां जन्मदिन मना रहे हैं। चलिए इस मौके पर जानते हैं उनके जीवन से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से।

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मुंबई

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Abhishek Mehrotra

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पीयूष पांडे

Apr 23, 2026

manoj bajpayee

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Manoj Bajpayee Birthday: बॉलीवुड अभिनेता मनोज बाजपेयी का आज 56वां जन्मदिन है। आज मनोज बाजपेयी को दुनिया भर में लोग जानते हैं। लेकिन, दिलचस्प किस्सा ये है कि जब गांव के ज्योतिषी पंचानन मिश्रा ने मनोज के जन्म के बाद कुंडली देखकर उनके अभिनेता बनने की भविष्यवाणी की थी तो पिता राधाकांत बाजपेयी दंग रह गए थे। चलिए मनोज बाजपेयी के जन्मदिन के मौके पर उनके जीवन से जुड़े कुछ पहलुओं पर नजर डालते हैं।

मनोज बाजपेयी के पिता फिल्मों के शौकीन थे (Manoj Bajpayee Birthday)

मनोज बाजपेयी के पिता राधाकांत बाजपेयी यूं तो फिल्मों के बड़े शौकीन थे। इतने ज्यादा कि कॉलेज के दिनों में वो बेतिया में हर नयी फिल्म का पहला शो देखते थे और इसी शौक के चक्कर में उन्होंने फिल्मबाबू का काम भी किया था। फिल्मबाबू यानी वो शख्स जो फिल्म की रील को वितरक के यहां से सिनेमाघर तक पहुंचाता था। मनोज बाजपेयी की बड़ी बहन कामिनी जी ने मुझे बताया था,"बाबूजी पटना से मुजफ्फरपुर रील का डिब्बा लेकर आते थे। पार्टटाइम फिल्मबाबू का काम था उनका।'

मनोज बाजपेयी हमेशा से बनना चाहते थे एक्टर

फिल्म का कीड़ा मनोज बाजपेयी के जींस में हैं, ये कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं है। लेकिन, जब ज्योतिषी पंचानन मिश्रा ने उनकी कुंडली देखकर कहा कि ये लड़का बड़े होकर नेता बनेगा या अभिनेता तो पिता अभिनेता की बात सुनकर दंग रह गए थे क्योंकि बिहार के छोटे से गांव बेलवा से मुंबई तक पहुंचना किसी सपने से कम नहीं था। हां, पिता को ये जरुर लगा था कि मनोज बड़े होकर नेता बन सकते हैं क्योंकि राधाकांत बाजपेयी के बड़े भाई कांग्रेस के नेता थे। मनोज ने 'राजनीति' जैसी फिल्म भले की हो लेकिन मुझसे बातचीत में ही वह कई बार कह चुके हैं कि उनका राजनीति में आने का कोई इरादा नहीं है।

राजनीति में आने का प्रस्ताव

मनोज बाजपेयी ने एक बार मुझे बताया था कि 'तमन्ना' फिल्म के रिलीज के बाद पहली बार मुझे राजनीति में आने का प्रस्ताव मिला था, और तब से आज तक हर साल मेरे पास प्रस्ताव आते हैं, लेकिन मेरा प्रण है कि मैं कभी राजनीति में नहीं जाऊंगा क्योंकि राजनीति मेरा क्षेत्र नहीं है। मैं राजनीति के लिए नहीं बना हूं।

जहां तक मनोज के एक्टर बनने का सवाल है तो भले उनके पिता ज्योतिषी की भविष्यवाणी को लेकर असमंजस में थे लेकिन मनोज ने इसकी पहली झलक तभी दिखा दी थी, जब वो महज सात-आठ साल के थे। राधाकांत जी ने मुझे बताया था, 'एक बार गार्जियन डे पर हम मनोज के स्कूल गए। वहां मनोज एक नाटक में हिस्सा ले रहा था। इसमें मनोज एक देहाती पंडित के चेले का रोल निभा रहा था। नाटक के एक दृश्य में पंडित जी और उनका चेला(मनोज) मंच पर आते हैं। चेला मिट्टी के एक बर्तन में मिठाई लाकर पंडित जी को देता है। पंडितजी बर्तन से एक एक रसगुल्ला निकालकर खाते हैं।

मनोज के नाटक पर दर्शकों ने बजाईं तालियां

चेला उन्हें ललचाई नजर से देखता है। अचानक संवाद बोलते हुए एक रसगुल्ला पंडित जी के हाथ से फिसलकर स्टेज पर गिर जाता है। लेकिन जैसे ही रसगुल्ला स्टेज पर गिरता है, चेला फुर्ती से रसगुल्ला उठाता है और मुंह में डाल लेता है। ये सीन नाटक का हिस्सा नहीं था। और जिस चपलता से मनोज ने यह किया, उस देखकर दर्शकों ने खूब तालियां बजाईं। नाटक के मध्यांतर में मनोज मुझसे मिलने आया तो मैंने पूछा कि क्या वो हरकत नाटक का हिस्सा थी।

तो बोला-नहीं। मैंने पूछा कि फिर कैसे किया। तो बोला-बस दिमाग में आया तो कर दिया। मुझे उसी वक्त डाउट हो गया था कि ये लड़का कुछ इधर-उधर का ही करेगा।, इस नाटक का नाम था 'बेमेल ब्याह'। और इस नाटक में पहली बार मनोज ने बिना जाने वो कारनामा किया था, जिसे थिएटर और सिनेमा की भाषा में एंप्रूवाइजेशन कहा जाता है।

मनोज कुमार के नाम पर रखा था नाम

मनोज के पिता को भले उनके अभिनेता बनने को लेकर असमंजस रहा हो लेकिन उन्होंने अपने सबसे बड़े बेटे का नाम अभिनेता मनोज कुमार के नाम पर रखा था। मनोज के पिता फिल्मी पत्रिकाएं बहुत पढ़ते थे। मनोज के जन्म के समय मनोज कुमार का हिन्दी सिनेमा में जलवा था। 1967 में आई ‘पत्थर के सनम’ और ‘उपकार’ ने तो धूम मचा दी थी। राधाकांत बाजपेयी जी ने मुझे बताया था, 'मैं उस वक्त फिल्मफेयर पत्रिका बहुत पढ़ता था और मैंने अभिनेता मनोज कुमार के नाम पर ही बड़े बेटे का नाम मनोज रखा।'

मनोज को नहीं पसंद आया नाम

पिता ने बेटे का नाम जरुर मनोज रखा, लेकिन बेटे को यह नाम अरसे तक पसंद नहीं आया। मनोज बाजपेयी कहते हैं-“मनोज नाम बिहार में बहुत कॉमन है। मनोज टायरवाला, मनोज भुजियावाला, मनोज मीटवाला और ना जाने क्या क्या। ऐसे बहुत सारे मनोज आपको मिलेंगे बिहार में। मैंने ये सोचा था कि मैं अपना नाम बदलूंगा। मैंने अपने लिए एक नया नाम भी सोच लिया था। ये नाम था समर। थिएटर के ज़माने में नाम बदलने के बारे में सोचा तो सबने कहा कि एक एफिडेविट बनवाना पड़ेगा।

अखबार में विज्ञापन देने होंगे। यह सब कानूनी प्रक्रिया थी। उस वक़्त पैसे नहीं थे तो ये कार्यक्रम स्थगित हो गया। फिर मैने सोचा कि जब मैं कमाऊंगा, तब नाम बदल लूंगा। 'बैंडिट क्वीन' के लिए जब धन मिला तो सोचा कि अब नाम बदलता हूं। लेकिन तब मेरे भाई ने कहा कि यार आप कमाल करते हो। आपकी पहली फिल्म देखेंगे लोग तो मनोज बाजपेयी और बाद में कुछ और नाम? बस फिर मैंने नाम बदलने की बात कैंसिल कर दी और सोचा कि अब जो हो गया बस हो गया।”

( पीयूष पांडे ने अभिनेता मनोज बाजपेयी की जीवनी 'कुछ पाने की ज़िद' लिखी है)

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