
बॉलीवुड सुपरस्टार राजेश खन्ना। (फोटो- IANS)
राजेश खन्ना को प्यार से 'काका' कहा जाता था, वे बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार थे। लेकिन 1980 के दशक के अंत में, जब उनका फिल्मी करियर उतार पर था, उन्होंने एक नई राह चुनी – राजनीति की।
यह कहानी है उनकी दिल्ली में सांसद के रूप में पांच साल की यात्रा की, जहां ग्लैमर की चकाचौंध से निकलकर वे संसद की गंभीर दुनिया में कदम रखते हैं।
यह सफर उतार-चढ़ाव से भरा था, जहां स्टारडम की चमक कभी सहारा बनी, तो कभी बोझ। सब कुछ 1984 से शुरू हुआ, जब राजेश खन्ना ने कांग्रेस पार्टी के लिए प्रचार करना शुरू किया।
तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कहने पर वे चुनावी मैदान में उतरे। राजेश को राजनीति में रुचि थी, लेकिन उनका प्रवेश व्यक्तिगत कारणों से भी जुड़ा था।
अमिताभ बच्चन, जो कभी उनके दोस्त थे, राजीव गांधी से बिगड़े रिश्तों के चलते राजनीति से दूर हो चुके थे। कुछ लोग कहते हैं कि राजेश खन्ना का नामांकन बच्चन के खिलाफ एक तरह का बदला था।
1991 के लोकसभा चुनाव में, राजेश खन्ना को नई दिल्ली सीट से कांग्रेस का टिकट मिला। उनका मुकाबला था बीजेपी के दिग्गज लाल कृष्ण आडवाणी से। चुनावी माहौल गर्म था।
दिल्ली की सड़कों पर राजेश खन्ना की रैलियां देखने लायक होतीं। मशहूर पत्रकार अरुण कुमार बताते हैं कि लोग उनके गानों पर झूमते, 'बाबू मोशाय' चिल्लाते।
राजेश ने वादा किया था कि वे दिल्ली को और बेहतर बनाएंगे – सड़कें, पानी, बिजली। मतगणना के दिन, राजेश खन्ना काउंटिंग स्टेशन पर खड़े थे।
परिणाम आया- आडवाणी जीते, महज 1,589 वोटों से। राजेश खन्ना स्तब्ध थे। उन्होंने दावा किया कि धांधली हुई है। उन्होंने कहा- मैं हार नहीं माना। तेकिन हार हुई है।
राजेश निराश हुए, लेकिन हार ने उन्हें और मजबूत बनाया। फिर आया 1992 का उप-चुनाव। आडवाणी ने सीट छोड़ दी और कांग्रेस ने फिर राजेश को मैदान में उतारा।
इस बार प्रतिद्वंद्वी था एक और फिल्म स्टार – शत्रुघ्न सिन्हा, जो बीजेपी से लड़ रहे थे। यह मुकाबला बॉलीवुड बनाम राजनीति का नहीं, बल्कि दो सितारों का था। मीडिया में हंगामा मचा।
'शॉटगन' सिन्हा ने कहा, "मैं राजनीति में हूं, फिल्में छोड़ चुका हूं।" लेकिन राजेश खन्ना की लोकप्रियता चरम पर थी। वे घर-घर जाकर मिलते, लोगों से बात करते।
रैलियों में उनके पुराने गाने बजते – 'मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू'। जनता मंत्रमुग्ध। परिणाम आया: राजेश खन्ना ने 28,256 वोटों के अंतर से जीत हासिल की। दिल्ली की जनता ने अपना सुपरस्टार चुना। शत्रुघ्न ने बाद में कहा कि यह उनकी राजनीतिक जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी।
सांसद बनते ही राजेश का जीवन बदल गया। वे मुंबई से दिल्ली शिफ्ट हो गए। पहले सोम विहार में रहे, फिर दोस्त नरेश जुनेजा के वसंत कुंज अपार्टमेंट में।
चुनाव जीतने के बाद लोदी एस्टेट में सरकारी बंगला मिला। संसद भवन अब उनका नया स्टेज था। उन्होंने फिल्में छोड़ दीं – सिर्फ एक फिल्म 'खुदाई' की, जो 1994 में रिलीज हुई।
उन्होंने कहा- 'अब मैं सांसद हूं, जनता की सेवा करूंगा।' लेकिन राजनीति की दुनिया फिल्मों से अलग थी। यहां स्क्रिप्ट नहीं, रियल मुद्दे थे।
राजेश खन्ना को संसद की बहसों में हिस्सा लेना पड़ता। वे शिक्षा, स्वास्थ्य और दिल्ली की ट्रैफिक समस्याओं पर बोलते। एक बार उन्होंने संसद में कहा, "दिल्ली को विश्व स्तरीय शहर बनाना है, जैसे मेरी फिल्में विश्व स्तरीय हैं।"
उनके कार्यकाल में कुछ उल्लेखनीय काम हुए। वे कांग्रेस के वफादार थे, राजीव गांधी की नीतियों का समर्थन करते। दिल्ली में गरीबों के लिए योजनाओं पर जोर दिया।
एक घटना याद आती है – 1993 में, दिल्ली में बाढ़ आई। राजेश खन्ना खुद प्रभावित इलाकों में गए, राहत सामग्री बांटी। लोग उन्हें देखकर खुश होते, लेकिन कुछ आलोचक कहते, "वे सिर्फ शो कर रहे हैं।"
उनका प्रदर्शन औसत था। संसद में उपस्थिति अच्छी थी, लेकिन गहन बहसों में कम हिस्सा। कोई बड़ा विधेयक उनके नाम से नहीं जुड़ा। विवाद भी हुए। कुछ लोग उन्हें अहंकारी कहते, क्योंकि उनकी फिलमी स्टाइल राजनीति में फिट नहीं बैठती।
एक पत्रकार ने कहा- वे स्टार की तरह व्यवहार करते। लेकिन उनके ज्योतिषी दोस्त जय प्रकाश लालधागे वाले कहते हैं- वे दिल के साफ थे, जनता से जुड़े थे। वे अपने 81 लोधी एस्टेट के बंगले में सबसे मिलते। वहां पर सबको नाश्ता मिलता।
राजेश खन्ना की राजनीति व्यक्तिगत भी थी। अमिताभ से दुश्मनी बनी रही। 1996 में, जब अगला चुनाव आया, माहौल बदल चुका था। वे चुनाव हार गए। दिल्ली छोड़कर वे मुंबई लौटे, लेकिन राजनीति से जुड़े रहे। अंत तक कांग्रेस के लिए प्रचार करते।
इस पांच साल की यात्रा ने राजेश खन्ना को बदला। फिल्मों में वे रोमांटिक हीरो थे, राजनीति में जनसेवक। लेकिन स्टारडम का बोझ रहा। लोग उन्हें सांसद कम, काका ज्यादा मानते।
उनके कार्यकाल को 'उदासीन' कहा गया, लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने सेलिब्रिटी राजनीति का नया दौर शुरू किया। आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो लगता है कि राजेश खन्ना की नई दिल्ली यात्रा एक फिल्म की तरह थी – ड्रामा, इमोशन, और एक अंत जो हमेशा याद रहता। उनकी मौत 2012 में हुई, लेकिन उनकी विरासत बनी रही।
Updated on:
29 Dec 2025 02:01 pm
Published on:
29 Dec 2025 02:00 pm
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