19 अप्रैल 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

अगर मुस्लिम दोस्त न होते, तो नाना जिंदा न होते! Samay Raina ने सुनाई अपनी आपबीती

Samay Raina On Kashmiri Pandits Exodus: समय रैना अपनी आपबीती सुनाते हुए, कठिन दौर से गुजर रहे और अपने मुस्लिम दोस्तो की मोहब्बत की अहम भूमिका के बारे में बताया कि आज उनके मुस्लिम दोस्तों का सहयोग न केवल उनके परिवार के लिए वरदान साबित हुआ, बल्कि इसने समाज में भाईचारे और एकता का भी संदेश है।

2 min read
Google source verification
अगर मुस्लिम दोस्त न होते, तो नाना जिंदा न होते! समय रैना ने सुनाई अपनी आपबीती

समय रैना हुए इमोशनल (फोटो सोर्स: IMDb)

Samay Raina On Kashmiri Pandits Exodus: स्टैंडअप कॉमेडियन समय रैना हमेंशा से चर्चा में रहे है, लेकिन इन दिनों एक अलग वजह से सुर्खियों में हैं। हाल ही में एक यूट्यूब पॉडकास्ट 'दोस्तकास्ट' को दिए इंटरव्यू में समय ने अपने परिवार की वो दर्दनाक कहानी शेयर की, जो 1990 के कश्मीरी पंडित पलायन से जुड़ी है, जिसे सुन दिल दहल जाएगा।

इंसानियत और गुडविल का ही नतीजा, समय हुए इमोशनल

बता दें, समय रैना खुद एक कश्मीरी पंडित परिवार से हैं। उन्होंने बताया कि उनके नाना सोमनाथ कोल गांव के एक जाने-माने डॉक्टर थे, जो हमेशा गरीब मरीजों का फ्रि में इलाज करते थे। उन्हीं के नाम की एक चिट्ठी एक दिन घर पहुंची, जिसमें लिखा था कि अगले दिन उन्हें मार दिया जाएगा।

ये खबर सुनते ही उनकी मां और नानी बेहोश हो गईं। उस मुश्किल घड़ी में समय की बहादुर मौसी चुपचाप क्लीनिक पहुंचीं। वहां नाना के सालों के नेकी के काम आए। दरअसल, स्थानीय कश्मीरी मुसलमानों ने उन्हें पिछले रास्ते से सुरक्षित निकाला और आतंकियों को रोका। इस पर समय ने आगे कि अगर मेरे मुस्लिम दोस्त नहीं होते, तो नाना जिंदा न होते ये उनके नाना की इंसानियत और गुडविल का ही नतीजा था।

रातोंरात कश्मीर छोड़ने का फैसला

इसके बाद मेरे पूरे परिवार को रातोंरात कश्मीर छोड़ने का फैसला करना पड़ा, घरवालों ने सारा जरूरी सामान उठाया और ऊधमपुर के लिए तुरंत निकल गए ये सोचकर कि बस 2 हफ्तों में हम सब की वापसी होगी, लेकिन कब वो दो हफ्ते 25 साल में बदल गए और घर कभी वापस नहीं मिला।

बता दें, समय रैना के परिवार के लिए ये सफर काफी मुश्किलों भरा था, ये अपना बचपन, अपनी जड़ें और अपनी पूरी पहचान खो देना था। उन्हीं दिनों में 25 साल बाद जब उनकी मां सालों बाद कश्मीर गईं, तो वहां कुछ भी पहले जैसा नहीं था। वो फूट-फूटकर रो पड़ीं। दरअसल, उनकी पीढ़ी के कश्मीरी पंडित आज भी उस ट्रॉमा के साये में जीते हैं। एक ऐसी पीढ़ी, जिसके पास अपनी मिट्टी की यादें तो हैं, लेकिन लौटने का रास्ता नहीं।

बड़ी खबरें

View All

मनोरंजन

ट्रेंडिंग