गाजियाबाद। अगर आप बागपत या मेरठ के आसपास गांवों के रहने वाले हैं तो आपने माॅलीवुड के अमिताभ बच्चन के बारे में जरूर सुना होगा। गाजियाबाद का यह धाकड़ छोर वेस्ट यूपी के लाखों दिलों पर राज करता है।
उत्तर कुमार को माॅलीवुड का अमिताभ बच्चन कहा जाता है। उनकी फिल्म धाकड़ छोरा आज भी मॉलीवुड फिल्मों में नजीर मानी जाती है, लेकिन धाकड़ छोरा बनने का ये सफर इतना आसान नहीं रहा। शुरुआत से ही सभी उत्तर का विरोध करते रहे।
15 साल की उम्र में पहुंचे मुंबई और ड्रीम गर्ल के घर रुके
उत्तर कुमार बताते हैं, मुझे बचपन से ही एक्टिंग का शौक था। मैं चाहता था एक्टर बनूं लेकिन कैसे, ये नहीं पता था। पंद्रह साल की उम्र में जब मैं दसवीं में था तब एक्टर बनने के लिए मुंबई पहुंच गया। मां ने छिपकर मुझे दस हजार रुपए भी दिए। उन्होंने कहा, जब मैं पहली बार घर से निकला और मुंबई पहुंचा तो कोई जान पहचान नहीं थी। किसी से बात हुई तो उसने मेरी मदद की। मेरा बैग रखवाने के लिए वह किसी के घर ले गया। वहां पहुंचा तो एक अन्य सज्जन मिले। उन्होंने मेरा बैग रख लिया, तब उन्होंने बताया कि ये हेमा मालिनी का घर है। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था कि पहली बार में ही मैं ड्रीम गर्ल के घर पहुंच गया।
गांव वाले करते थे विरोध
उन्होंने कहा, मुंबई से कुछ दिन बाद मैं घर वापस आ गया। इसके बाद मैंने एक्टिंग का कोर्स किया। मैंने फिल्म मेकिंग की बारिकियां सीखीं। गांव वाले मेरा विरोध करते थे। ताने मारते थे। कहते थे, ये हीरो बनने चला है। दूसरों का उदाहरण देते थे, जो पहले इस लाइन में असफल हो चुके थे। मेरे पास किसी सफल आदमी का उदाहरण नहीं था तो मैं चुपचाप सुनता रहता था। सब मुझे फिल्में न करने को समझाते थे लेकिन किसी ने भी हौसला नहीं बढ़ाया। मैंने एक्टिंग का कोर्स पूरा किया और फिर अपनी पहली फिल्म बावली में काम किया। मेरी मां सावित्री देवी ने स्ट्रगल के समय मेरा पूरा साथ दिया। इसके बाद आई मेरी ब्लॉकबस्टर मूवी धाकड़ छोरा। साढ़े चार लाख में बनी धाकड़ छोरा ने कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और आठ करोड़ की कमाई की।यह भी पढ़ें:क्या आपको पता है कहां गायब हो गई एेश्वर्या राय?
धर्मेंद्र का फैन हूं मैं
उत्तर कुमार ने कहा, मैं यमला जट धर्मेंद्र का फैन था। उनकी फिल्म मां डीडी वन पर देखती थी। तभी से मैं एक्टर बनने की ठान चुका था। जब पहली फिल्म मिली तो बहुत खशी हुई और फिल्म हिट रही।

लोग मारते थे ताने
अपने स्ट्रगल को याद करते हुए उन्होंने कहा, स्ट्रगल के दौरान लोग मुझे ताने मारते रहे। मैं रोता रहा। अकेले में बैठकर रोता, उदास भी होता लेकिन मैंने कभी हार नहीं मानी और आगे बढ़ता रहा। अपने काम को हमेशा ईमानदारी से किया। मेरे दोस्त अौर गुरु दिनेश चौधरी ने हमेशा मेरा साथ दिया। मैं हमेशा उनके साथ ही रहता हूं और साथ ही काम करते हैं।
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मॉलीवुड और बॉलीवुड में क्या अंतर
उत्तर बताते हैं, हिंदी और देहाती फिल्मों में बहुत अंतर है। सबसे बड़ा अंतर बजट का है। पैसा कम होने के कारण हमें कर्इ सुविधाएं नहीं मिलती हैं। टेक्निकल फर्क भी होता है, लेकिन हमें अपनी भाषा की फिल्म में काम करने में गर्व महसूस होता है। हम इस भाषा का प्रचार कर रहे हैं। अब फिल्मों और नाटकों में भी ये भाषा आने लगी है। वेस्ट के कैरेक्टर भी अब टीवी और बॉलीवुड में हमारी फिल्मों के बाद ही आने लगे हैं।
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स्टार बनने के बाद बदल गया
उत्तर बताते हैं, लोग पीठ पीछे जरूर कहते होंगे कि मैं बदल गया हूं, लेकिन जो मुझे जानते हैं उनको पता है कि मैं बदला नहीं हूं। पुराने दोस्त जब मिलते हैं तो कहते हैं, तुम बिलकुल नहीं बदले। उन्होंने कहा, मैं कभी हीरो की तरह नहीं रहता हूं। अगर जरूरत पड़े तो सेट पर झाडू, जनरेटर को धक्का, लाइट शिफ्ट करना, कैमरा चलाना, जो भी काम हो मैं करता हूं। मैं शर्माता नहीं हूं।
पहले सीखें, फिर करें काम
नए लोगों के लिए उत्तर कहते हैं, नए लोगों को बिना सीखे एक्टिंग या मूवी मेकिंग नहीं करना चाहिए। मैंने भी ये काम सीखने के लिए बहुत सारे कोर्स किए हैं। मैंने बहुत लोगों को काम में मदद भी की है। तब जाकर मैंने खुद काम शुरू किया। अब आज कल के लोग फिल्म करने से पहले सीखते नहीं हैं, जबकि फसल काटने के लिए भी आपको सीखना जरूरी है। फिल्मों में साइंस और गणित होता है। ये सीखना जरूरी है।
फिल्म में नहीं होती अश्लीलता
सामाजिक जिम्मेदारी के बारे में उन्होंने कहा, फिल्म के दौरान मुझे सामाजिक जिम्मेदारी का एहसास भी होता है। उसमें कोई ऐसी बात न हो, जिससे परिवार एक साथ बैठकर फिल्म न देख पाएं। हम फिल्म को पहले अपने घर में दिखाते हैं। फिल्म में अश्लीलता नहीं रखते। दिमाग में यही रहता है कि फिल्म बनाने के बाद किसी से सॉरी न बोलना पड़े।
फिल्में भी लिखते हैं उत्तर
उत्तर कहते हैं, मेरी कंपनी का नाम राजलक्ष्मी मूवीज है। ये मेरे दादा—दादी का नाम है। जब मेरे पिता गुस्सा होते थे, तब मेरे दादा-दादी ही हेल्प करते थे। मेरे पास दूसरी कंपनियों से भी काफी आॅफर आते हैं, लेकिन मैं और मेरे दोस्त दिनेश ही अपनी फिल्में लिखते हैं। मैंने कुछ बाहरी फिल्में की लेकिन वह चली नहीं। अब अगर कोई आॅफर लेकर आता है तो उसके साथ भी हम अपनी स्टोरी और अपनी टीम के साथ ही काम करते हैं।
ज्वाइंट फैमली में रहता हूं
अभी भी मैं गांव में ज्वाइंट फैमली के साथ रहता हूं। वहीं से आॅफिस जाता हूं या शूटिंग पर जाता हूं। हीरो बनने के बाद अब लोग मुझे और ज्यादा प्यार करने लगे हैं।
एकेडमी खोली
उत्तर बताते हैं, नए बच्चे आते हैं आैर कहते हैं कि मेरे जैसा बनना चाहते हैं। इसके लिए हमने दिल्ली और गुड़गांव में टायकून फिल्म एकेडमी खोली है। वहां पर फिल्म डायरेक्शन सिखाया जाता है। उत्तर कुमार की धाकड़ छोरा डॉट काम वेबसाइट भी है। जहां पर उनके बारे में तमाम जानकारी उपलब्ध है। उत्तर के यू ट्यूब चैनल, धाकड़ छोरा टॉकीज पर उनकी तमाम फिल्मों को देखा जा सकता है। इस चैनल पर रोजाना हजारों फैन उनकी फिल्में देखते हैं।
आने वाली फिल्में
इस साल उत्तर कुमार की दो फिल्में आ रही हैं। वह बताते हैं, उनकी दो फिल्में पल दो पल का प्यार और कुंवर साहब आ रही हैं। दोनों फिल्में वेस्ट यूपी की पृष्ठभूमि पर आधारित हैं।