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GURU PURNIMA 2018 उस संत की कहानी जिसने राजनीति, समाजसेवा और अन्य जिम्मेेदारियों के साथ गुरु का साथ कभी नहीं छोड़ा

गुरू शिष्य परंपरा की अनूठी कहानी

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yogi with mahant avedhyanath

Yogi Aditynath with Mahant Avedyanath

गुरु को समाज में सर्वाेच्च स्थान मिला हुआ है। ऐसा इसलिए क्योंकि गुरुओं ने समय-समय पर वह नजीर पेश की जिसका समाज अनुसरण करता रहा है। भारतीय इतिहास तो गुरु-शिष्य की ऐसी तमाम कहानियां
का सदियों से गवाह रहा। अगर इस परम्परा की बात करें वह भी गोरखपुर के परिपेक्ष्य में तो गोरखनाथ मंदिर को इसके लिए बिसराया नहीं जा सकता। ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ और योगी आदित्यनाथ की भी गुरु-शिष्य की कहानी सदैव प्रेरणादायी रही हैं। एक सामान्य योगी से सांसद व मुख्यमंत्री तक का फासला तय करने वाले योगी आदित्यनाथ का इस सफलता में उनके गुरु का सर्वाधिक योगदान रहा। अपने गुरु के लिए भी इस पुत्र तुल्य शिष्य ने कभी प्रोटोकाल या अन्य कोई बंदिश नहीं बांधी जब भी मंदिर पहुंचते हैं तो सबसे पहले अपने गुरु के पास आशीर्वाद लेने उनकी प्रतिमा तक जाते हैं। 22 जुलाई 2016 को प्रधानमंत्री की मौजूदगी में अपने गुरु की प्रतिमा की स्थापना करवा कर उन्होंने गुरु-शिष्य की इस परंपरा को और पुख्ता किया था।
गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ जब महंत अवेद्यनाथ के संपर्क में आये तो उनकी उम्र बेहद कम थी। लेकिन अपने गुरु के संपर्क में आते ही उनको अपनी सेवा से लगातार प्रभावित करते रहे। इसी सेवाभाव और योगी बनने की कड़ी साधना में रत रहने का ही परिणाम है कि ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ ने 1994 में अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। उत्तराधिकारी घोषित करने के कुछ साल बाद ही महंतजी ने राजनीति से भी संन्यास ले लिया और अपने सबसे प्रिय शिष्य व उत्तराधिकारी को राजनीति का भी उत्तराधिकारी बना दिया। यहीं से योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक पारी शुरू हुई है। 1998 में गोरखपुर से 12वीं लोकसभा का चुनाव जीतकर योगी आदित्यनाथ संसद पहुंचे तो वह सबसे कम उम्र के सांसद थे, वो 26 साल की उम्र में पहली बार सांसद बने। 1998 से लगातार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। 2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद संसद सदस्य पद से त्याग पत्र दिया। हालांकि, मुख्यमंत्री बनने के बाद भी गोरखपुर से या मंदिर से उनका लगाव कम नहीं हुआ। प्रदेश की चिंता के साथ साथ गोरखपुर के विकास पर खासा ध्यान देते हैं।
हालांकि, इतनी व्यवस्तता के बावजूद योगी आदित्यनाथ ने मंदिर, राजनीति, समाजसेवा समेत सारी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के लिए सामन्जस्य के साथ अपने गुरु की सेवा करने में कभी कोई चूक नहीं किया। यह शुरू से ही कायम रहा। उस समय भी जब महंत जी जीवित रहे। तब भी जब कभी महंतजी बीमार पड़े उनके शिष्य योगी आदित्यनाथ हमेशा उनके साथ रहे यहां तक कि उनके ब्रह्मलीन होने के पहले तक वह उनकी सेवा कर अपना शिष्य धर्म बाखूबी निभाते रहे। यही नहीं उनके नहीं रहने पर भी उनके सपनों को पूरा करने के साथ गुरु-शिष्य परंपरा को निभा रहे। करीब डेढ़ साल पहले सूबे के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी भी मिल गई। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने अपने व्यस्ततम कार्यक्रम से परम्परों को निभाने का क्रम जारी रखा है।