19 मार्च 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

‘डाटा एंट्री ऑपरेटर’ की भर्ती रद्द, नया विज्ञापन जारी करने का आदेश

MP News: कोर्ट ने शिवपुरी कलेक्टर को निर्देश दिया है कि तीन माह के भीतर नया विज्ञापन जारी किया जाए।

2 min read
Google source verification
Data Entry Operator

Data Entry Operator (Photo Source - Patrika)

MP News: हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने शिवपुरी में कार्यालय सहायक/डाटा एंट्री ऑपरेटर के लिए जारी 2014 का भर्ती विज्ञापन निरस्त कर दिया है। कहा कि भर्ती प्रक्रिया नियमों के विपरीत की गई थी, इसलिए इसके आधार पर की गई सभी नियुक्तियां भी निरस्त मानी जाएंगी।

कोर्ट ने शिवपुरी कलेक्टर को निर्देश दिया है कि तीन माह के भीतर नया विज्ञापन जारी किया जाए। तत्कालीन कलेक्टर एवं अतिरिक्त कलेक्टर के खिलाफ कार्रवाई का भी आदेश दिया। अदालत ने 1.75 लाख का जुर्माना लगाया है, जिसमें से 1.50 लाख रुपए याचिकाकर्ता को मुकदमे की लागत के रूप में देने और 25 हजार रुपए नगर निगम ग्वालियर के स्वच्छता खाते में जमा कराने के निर्देश दिए गए हैं।

साथ ही यह राशि संबंधित दोषी अधिकारी से वसूलने की अनुमति शासन को दी गई है। अतिरिक्त शर्त जोड़ी गई जस्टिस आनंद सिंह बह्रावत की एकलपीठ ने यह आदेश योगेश कुमार कुशवाह की याचिका पर दिया। याची का कहना था कि लोक सेवा प्रबंधन विभाग के 14 जुलाई 2011 के सर्कुलर के अनुसार केवल स्नातक योग्यता और तय प्रक्रिया के आधार पर चयन होना था, लेकिन शिवपुरी में जारी विज्ञापन में 60 प्रतिशत अंकों की अतिरिक्त शर्त जोड़ी गई। जिससे लोगों को नौकरी मिली।

संपत्ति जांच पर हाईकोर्ट सख्त

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अनुपातहीन संपत्तियों के एक मामले में आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) की कार्यप्रणाली पर हैरानी जताई है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की डिवीजन बेंच ने पूछा कि जब याचिकाकर्ता का जन्म 1996 में हुआ और उसे 2023 में नौकरी मिली, तो 1997 से 2021 तक की संपत्तियों की जांच किस आधार पर की जा रही है? कोर्ट ने ईओडब्ल्यू के डीजी व उनके विधिक सलाहकार से सात दिन में जवाब मांगा है।

छतरपुर निवासी कृष्ण प्रताप सिंह चंदेल की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि उनका जन्म 1996 में हुआ। 2023 में सरकारी नौकरी मिली। इसके बावजूद ईओडब्ल्यू ने 1 अप्रेल 1997 से 31 मार्च 2021 तक की अवधि को 'चेक पीरियड' मानते हुए संपत्ति की जांच शुरू कर दी।

याचिका में तर्क दिया गया कि उक्त अवधि में याचिकाकर्ता नाबालिग था। सरकारी सेवा में भी नहीं था। ऐसे में इस अवधि की संपत्ति को आय से अधिक कैसे माना जा सकता है? मूल एफआईआर याची के भाई के खिलाफ दर्ज की गई थी। उनके भाई समिति प्रबंधक के पद पर कार्यरत थे और उन पर आय से अधिक संपत्ति का आरोप था। बाद में परिवार के अन्य सदस्यों के साथ याचिकाकर्ता का नाम भी जोड़ दिया गया। इसी आधार पर याचिकाकर्ता को नौकरी से हटा दिया गया।