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ग्वालियर हाइकोर्ट का बड़ा फैसला, मां की ‘वसीयत’ में एक बेटे का हिस्सा बढ़ा

High Court news: जस्टिस आशीष श्रोती की बैंच ने मामले की सुनवाई करते हुए ग्वालियर के छठवें अतिरिक्त जिला न्यायाधीश द्वारा वर्ष 2018 में दिए गए उस फैसले को संशोधित कर दिया है...
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ग्वालियर

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Astha Awasthi

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Updated: 19 Jun 2026, 1:42 PM IST

Gwalior Court overturns death sentence in a major ruling

Gwalior High Court: हाइकोर्ट का फैसला (Photo Source- freepik)

Gwalior High Court: मध्यप्रदेश के ग्वालियर शहर में हाईकोर्ट की सिंगल बैंच ने संपत्ति विवाद से जुड़े एक मामले में फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि यदि मां ने अपने जीवनकाल में किसी एक बेटे के पक्ष में वैध वसीयत की है, तो उस बेटे का संपत्ति में हिस्सा बढ़ जाएगा। कोर्ट ने इस आधार पर मकान खरीदने वाले बाहरी व्यक्ति को बड़ी राहत देते हुए उसे मकान के दो-तिहाई (2/3) हिस्से का कानूनी हकदार माना है।

जस्टिस आशीष श्रोती की बैंच ने मामले की सुनवाई करते हुए ग्वालियर के छठवें अतिरिक्त जिला न्यायाधीश द्वारा वर्ष 2018 में दिए गए उस फैसले को संशोधित कर दिया है, जिसमें खरीदार की आपत्तियों को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया था। मामला कंपू स्थित जवाहर कॉलोनी के एक मकान (नंबर 50/1066) से जुड़ा है, जिसे मूल रूप से बाला साहब देशमुख ने बनवाया था।

उनकी मृत्यु के बाद वर्ष 1995 में हुए एक अदालती फैसले में मां त्रिवेणी देशमुख और उनके दो बेटों ने राम देशमुख व लक्ष्मण देशमुख को संपत्ति में 1/3-1/3 हिस्सा दिया गया था। बाद में राम देशमुख ने बंटवारे के लिए एक नया मुकदमा दायर किया। इस मुकदमे के लंबित रहने के दौरान ही मां त्रिवेणी देशमुख का निधन हो गया। इसी दौरान दूसरे भाई लक्ष्मण देशमुख ने वर्ष 2004 में पूरा मकान 16.40 लाख रुपए में विकास शर्मा (अपीलकर्ता) को बेच दिया और उन्हें कब्जा भी सौंप दिया।

भाई की मौन सहमति

-मकान बेचने के तुरंत बाद लक्ष्मण देशमुख अदालत की कार्यवाही से गायब हो गए और कोर्ट ने राम देशमुख के पक्ष में एकतरफा फैसला सुनाते हुए दोनों भाइयों का आधा-आधा हिस्सा तय कर दिया था। जब मकान खाली कराने की नौबत आई, तब खरीदार विकास शर्मा ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और आरोप लगाया कि दोनों भाइयों ने मिलकर उनके साथ धोखाधड़ी और मिलीभगत की है।

-एग्जीक्यूशन (निष्पादन) की कार्यवाही के दौरान खरीदार विकास शर्मा ने कोर्ट के सामने वह मूल वसीयत पेश की, जो मां त्रिवेणी देशमुख ने वर्ष 1996 में लक्ष्मण देशमुख के पक्ष में की थी। गवाहों की गवाही से यह वसीयत पूरी तरह वैध पाई गई ।

गर्भ समाप्त करने की दी अनुमति

पति से अलग रह रही गर्भवती महिला को हाईकोर्ट ने आखिरकार गर्भ समाप्त करने की अनुमति दे दी है। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर की कोर्ट ने महिला द्वारा दायर याचिका का निराकरण करते हुए टिप्पणी की कि जब महिला वैवाहिक विवाद और गंभीर मतभेदों के कारण गर्भावस्था जारी नहीं रखना चाहती, तो उसकी इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने एमवायएच को गर्भपात के लिए जल्द चिकित्सकीय प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश भी दिए हैं। बता दें एक महिला ने अपने पति से अलगाव के बीच गर्भपात की अनुमति के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। महिला ने कोर्ट को बताया था कि उसकी शादी धार जिले के धरमपुरी थाना क्षेत्र के युवक से हुई थी और वह वर्तमान में गर्भवती है।