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39 साल बाद किसानों को राहत, एमपी हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, भूमि अधिग्रहण मुआवजा बढ़ाया

MP High Court Big Decision After 39 Years: ग्वालियर हाईकोर्ट ने 39 साल बाद सुनाया फैसला। भूमि अधिग्रहण मुआवजा 5 की जगह 9 रुपए प्रति वर्गफीट किया। ग्वालियर-गुना रेल लाइन और लिंक रोड से दो हिस्सों में बंट गया था 'संत फार्म।'
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MP High Court gwalior

MP High Court gwalior:

MP Land Acquisition Case: लगभग चार दशक से न्याय की लड़ाई लड़ रहे किसानों को आखिरकार बड़ी राहत मिली है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ की सिंगल बेंच ने शिवपुरी जिले के कोलारस स्थित चर्चित 'संत फार्म' भूमि अधिग्रहण मामले में किसानों के पक्ष में फैसला सुनाया है। कृषि भूमि के नुकसान का आकलन कर मुआवजे की दर 5 रुपए प्रति वर्गफीट से बढ़ाकर 9 रुपए प्रति वर्गफीट करने के आदेश दिए हैं। रेलवे की उस अपील को भी खारिज कर दिया, जिसमें जिला अदालत के फैसले को काल्पनिक बताते हुए निरस्त करने की मांग की गई थी।

यह है पूरा मामला

मामला 1987-88 का है। तब ग्वालियर-गुना ब्रॉडगेज रेलवे लाइन और रेलवे स्टेशन निर्माण के लिए शिवपुरी जिले के ग्राम जगतपुर स्थित संत फार्म की 3.627 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया गया था। लिंक रोड निर्माण के लिए भी 4.788 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहित की गई। रेलवे लाइन और सड़क खेत के बीच से गुजरने के कारण पूरा फार्म दो हिस्सों में बंट गया। खेतों तक सिंचाई पहुंचाना मुश्किल हो गया। किसानों को फसल नुकसान उठाना पड़ा। भू-स्वामी हिम्मत सिंह और अन्य किसानों ने अदालत का दरवाजा (MP Land Acquisition Compensation Case) खटखटाया। मामला जिला अदालत से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। शीर्ष कोर्ट ने 2013 में भूमि विभाजन, तार फेंसिंग हटाने और कृषि नुकसान के आकलन से जुड़े मुद्दों पर मामला दोबारा रेफरेंस कोर्ट भेजा था। जिला अदालत ने 2019 में किसानों के पक्ष में अतिरिक्त मुआवजा तय किया।

वास्तविक नुकसान हुआ

जिला अदालत के फैसले (MP High Court Decision on Land Acquisition Case) के खिलाफ किसान और रेलवे ने हाईकोर्ट में अपील की। सुनवाई के दौरान रेलवे ने अतिरिक्त मुआवजे को काल्पनिक बताते हुए रद्द करने की मांग की, लेकिन हाईकोर्ट ने तर्क स्वीकार नहीं किया। माना कि भूमि के विभाजन और सिंचाई व्यवस्था प्रभावित होने से किसानों को वास्तविक नुकसान हुआ है। इसी आधार पर जिला अदालत के आकलन को सही ठहराते हुए मुआवजे की दर बढ़ाने का आदेश बरकरार रखा।

39 साल बाद मिली राहत

करीब 39 साल पुराने इस विवाद में आए फैसले से प्रभावित किसानों को लंबे इंतजार के बाद राहत मिली है। यह निर्णय भविष्य में भूमि अधिग्रहण से जुड़े ऐसे मामलों के लिए भी अहम माना जा रहा है, जहां अधिग्रहण के बाद शेष भूमि की उपयोगिता प्रभावित होती है।