
MP High Court: आय का हिसाब मांगने का आदेश बरकरार (Photo Source - Patrika)
Gwalior news: हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने संपत्ति बंटवारे के मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि प्रारंभिक डिक्री पारित होने के बाद भी यदि अंतिम डिक्री लंबित है, तो इस दौरान संयुक्त संपत्ति से अर्जित आय की जांच कराई जा सकती है। जस्टिस अमित सेठ की बेंच ने कहा कि सह-स्वामियों में से किसी एक ने यदि विवादित संपत्ति से लाभ कमाया है, तो अन्य सह-स्वामियों को भी उस आय में उनके हिस्से का अधिकार मिल सकता है।
अदालत ने कहा कि पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने और नए मुकदमों से बचने के लिए ट्रायल कोर्ट को सिविल प्रक्रिया संहिता के ऑर्डर-20 रूल-18 हो के तहत ऐसी जांच कराने का अधिकार है। इसी टिप्पणी के साथ कोर्ट ने संभाजी राव आवाड़ और जयेंद्र आवाड की ओर से दायर दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं। इसके साथ ही पहले दिया गया स्थगन आदेश भी स्वतः समाप्त हो गया।
मामले के अनुसार, निवेदिता ने माता-पिता के निधन के बाद पैतृक संपत्ति में अपने हिस्से के लिए विभाजन का वाद दायर किया था। वर्ष 2008 में ट्रायल कोर्ट ने उनके पक्ष में प्रारंभिक डिक्री पारित की थी, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा। अंतिम डिक्री की कार्यवाही लंबित रहने के दौरान निवेदिता ने आवेदन देकर आरोप लगाया कि संयुक्त संपत्ति में जयेंद्र आवाड़ उनकी सहमति के बिना ऑर्किड नाम से स्कूल संचालित कर रहे हैं और लगभग 20 लाख रुपए प्रतिमाह की आय अर्जित कर रहे हैं। उन्होंने अदालत से इस आय का लेखा-जोखा प्रस्तुत कराने और अपने हिस्से का लाभ (मीन प्रॉफिट) दिलाने की मांग की थी।
बीते दिनों दूसरे मामले में हाइकोर्ट ने कहा था कि यदि पत्नी सरकारी नौकरी में है और उसकी आय स्वयं के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त है, तो वह पति से अंतरिम गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं होगी। हालांकि, मां के कमाने भर से पिता अपनी नाबालिग संतान के पालन-पोषण और शिक्षा की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। कोर्ट ने ग्वालियर फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए पति और पत्नी, दोनों की पुनरीक्षण याचिकाएं खारिज कर दीं।
Updated on:
30 Jul 2026 05:22 pm
Published on:
30 Jul 2026 05:21 pm
