
Gwalior High Court Verdict on the 'Creamy Layer' in OBC Reservation(फोटो-Patrika.com)
OBC- आरक्षण पर एमपी हाईकोर्ट का बड़ा फैसला सामने आया है। इसमें कोर्ट ने क्रीमीलेयर की पात्रता की स्पष्ट व्याख्या की है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने ओबीसी क्रीमीलेयर की पात्रता को लेकर अहम व्यवस्था दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी महिला अभ्यर्थी का क्रीमीलेयर स्टेटस तय करने में उसके पति की आय या पद को आधार नहीं बनाया जा सकता। आरक्षण का लाभ लेने के लिए अभ्यर्थी के माता-पिता की सामाजिक और आर्थिक स्थिति ही एकमात्र पैमाना होगी। फैसले के साथ कोर्ट ने सहायक प्राध्यापक (लॉ) के पद पर हुई एक नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।
ओबीसी क्रीमीलेयर के संबंध में ग्वालियर हाईकोर्ट ने अहम व्यवस्था की
मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण में बढ़ोत्तरी का मामला कोर्ट में चल रहा है। दो केस की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट कर रहा है वहीं अन्य सभी केस हाईकोर्ट जबलपुर में सुने जा रहे हैं। प्रदेश में कांग्रेस सरकार द्वारा ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की गई थी जिसे कोर्ट में चुनौती दी गई। तभी से यह मामला कानूनी उलझनों में उलझा है। इस बीच ओबीसी क्रीमीलेयर के संबंध में ग्वालियर हाईकोर्ट ने अहम व्यवस्था की है।
याचिकाकर्ता सुनीता यादव ने चयनित अभ्यर्थी गरिमा राठौर की नियुक्ति को यह कहते हुए चुनौती दी थी कि गरिमा ओबीसी क्रीमीलेयर की श्रेणी में आती हैं। तर्क था कि गरिमा के पति सिविल जज हैं। उनकी पारिवारिक आय तय सीमा से कहीं अधिक है, इसलिए उन्हें ओबीसी कोटे का लाभ नहीं मिलना चाहिए। सुनीता ने मांग की थी कि गरिमा की नियुक्ति रद्द कर उन्हें 2021 से वरिष्ठता के साथ नियुक्ति दी जाए।
याचिका की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि क्रीमीलेयर का निर्धारण जन्म के आधार पर मिली सामाजिक स्थिति से होता है। अभ्यर्थी की स्वयं की आय या उसके पति की आय को माता-पिता की आय में नहीं जोड़ा जा सकता।
मामले में चयनित अभ्यर्थी गरिमा के पिता वर्ग-3 के कर्मचारी थे और माता गृहिणी थीं। कोर्ट ने साफ कहा कि उनके आरक्षण के लिए माता-पिता की स्थिति ही पैमाना मानी जाएगी। पति की सैलरी से पत्नी गरिमा की स्थिति तय नहीं होगी।
Published on:
05 Apr 2026 11:51 am
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