
भक्ति के भाल पर तेजस्विता का तिलक है नवरात्र। सनातन हिंदू धर्म में आराधना की अपनी पद्धति और साधना की अपनी शैली है। मातृशक्ति की स्तुति की आकृति है नवदुर्गा और प्रस्तुति की पेढ़ी है नवरात्र। दूसरा नवरात्र इस संदर्भ में देवी की शक्ति ? और भक्तों की भक्ति की रवानी को रेखांकित करता है। देवी द्वारा, दुष्टों के दलन की कहानी को भी चिह्नित करता है।
दूसरा नवरात्र दरअसल देवी नवदुर्गा के विग्रह/ रूप को, 'ब्रह्मचारिणीÓ मूरत में अभिव्यक्त करता है, जबकि अनुग्रह स्वरूप को महालक्ष्मी की महिमा में बतलाता है। नवदुर्गा की मातृशक्ति के रूप में व्यक्ति के पीछे भावना यही है, 'मांÓ संतान के प्रति स्नेहिल तो होती ही है, सरल और सदा सुलभ भी होती है। परिवार के उदाहरण से इसको आसानी से समझा जा सकता है, पिता और माता जिसके दो महत्वपूर्ण ध्रुव होते हैं। परिवार में प्राय: पिता की पोथी में 'अनुशासन के अध्याय होते हैंÓ, जबकि माता की किताब में स्नेह की स्याही से अंकित 'आत्मीयता के अक्षरÓ होते हैं।
तात्पर्य यह है कि मां संतान की पुकार सुनकर तुरंत पसीज जाती है। इसीलिए मातृशक्ति के रूप में जब देवी की भक्ति और आराधना की जाती है तो 'मांÓ होने के कारण देवी तुरंत पसीजकर रक्षा करने चली आती है, क्योंकि माता का कार्य ही संतान का पालन और रक्षा करना है। महाभारत के शांतिपर्व के दो सौ छब्बीसवें अध्याय के उनतीसवें श्लोक में कहा गया है, ''संतान समर्थ हो या असमर्थ, दुर्बल हो या हष्टपुष्ट, माता उसका पालन करती है। माता के सिवाय कोई दूसरा विधिपूर्वक संतान का पालन नहीं कर सकता।
दूसरे नवरात्र में जैसा कि कहा जा चुका है नवदुर्गा का विग्रह है ब्रह्मचारिणी। अनुग्रह है महालक्ष्मी। अत: महालक्ष्मी की महिमा स्वयंसिद्ध हो जाती है। श्री दुर्गा सप्तशती के पांचवें अध्याय के छप्पनवें श्लोक में कहा भी है, ''या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:ÓÓ अर्थात जो देवी सब प्राणियों में लक्ष्मी रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार।
यहां यह उल्लेखनीय है कि महिषासुर नामक दैत्य का वध करने के लिए ही महालक्ष्मी का अवतरण हुआ। श्री दुर्गा सप्तशती के दूसरे अध्याय में महिषासुर की सेना का वध और तीसरे अध्याय में महिषासुर वध का वर्णन है। इस प्रकार माता महालक्ष्मी ने महिषासुर को मारकर अधर्म का नाश किया तथा देवताओं और स्वर्ग की रक्षा की। कथा का सारांश यह है कि महिषासुर (भैंसे जैसा राक्षस) ने स्वर्ग पर अधिकार के लिए देवताओं से युद्ध किया।
देवता परास्त होने लगे तब वे श्री विष्णु की शरण में गए। विष्णु और शंकर के तेज से महालक्ष्मी का अवतरण हुआ। महालक्ष्मी ने महिषासुर का वध कर दिया। वर्तमान में इसका अर्थ यह है कि जब नारी शक्ति के रूप में महालक्ष्मी ने देवताओं की रक्षा की तो हमें अपने घर में बेटियों/ बहुओं/ बहनों/ माताओं को आदर देना चाहिए।
Published on:
22 Sept 2017 09:15 am
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