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मौत इस गांव में तो अंतिम संस्कार होता है दूसरे गांव में,मामला सुनेंगे तो अचरज में पड़ जाएंगे

कई गांवों में हाल ये हैं कि अगर गांव में किसी की मौत हो जाए तो उसे अंतिम संस्कार के लिए दूसरे गांव ले जाना पड़ता है। ऐसे हाल अधिकांश गांवों के हैं।

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ग्वालियर/दतिया। मध्यप्रदेश के दतिया में असुविधाएं मरने के बाद भी लोगों का पीछा नहीं छोड़ रही हैं। चौंकिए नहीं। ये सच्चाई है। आपको बता दें कि जिले के कई गांवों में हाल ये हैं कि अगर गांव में किसी की मौत हो जाए तो उसे अंतिम संस्कार के लिए दूसरे गांव ले जाना पड़ता है। ऐसे हाल अधिकांश गांवों के हैं।

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दरअसल मौत के बाद किसी भी शव की दुर्गति न हो । सम्मान से व सुरक्षित रूप से अंतिम संस्कार किया जा सके। इसके लिए शासन ने हर गांव में श्मशान घाट बनाने का प्रावधान किया है। इसके लिए ग्रामीण विकास विभाग को पौने दो लाख रुपए राशि भी देने का प्रावधान है। बावजूद इसके विभाग के तकनीकी अमले की बेरुखी मानें या फिर ग्राम पंचायतों की लापरवाही। अब तक जिले के एक तिहाई गांवों में भी श्मशान घाट नहीं बन सके हैं। हालात ये बनते हैं कि मौत होने पर अर्थी को या तो दूसरे गांव में ले जाना पड़ता है या फिर असुरक्षित रूप से शव को जलाना पड़ता है।

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प्रदेश के ग्रामीण विकास विभाग ने करीब पांच साल पहले ही तय कर दिया था कि प्रदेश के हर जिले के प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक श्मशान घाट बनाया जाएगा। करीब एक साल पहले विभाग में राधेश्याम जुलानियां बतौर अतिरिक्त मुख्य सचिव पदस्थ हुए तो उन्होंने आदेश जारी किए कि हर पंचायत में नहीं बल्कि हरेक गांव में श्मशान घाट बनाया जाना चाहिए। ताकि किसी की मौत के बाद परिजनों को उसकी अर्थी को दूसरे गांव में अंतिम संस्कार के लिए न ले जाना पड़े।

विभाग की मंशा को निचले तबके का स्टाफ ही गंभीरता से नहीं ले रहा। हद दर्जे की लापरवाही का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि श्मशान के लिए तय वक्त तीन महीने गुजरने के बाद भी श्मशान घाटों का निर्माण नहीं हो सका। जबकि इस काम के लिए शासन की ओर से 1.80 लाख रुपए देना तय किया गया है।

बरसात व सर्दी में भी खुले आसमान के नीचे: प्रदेश शासन की मंशा थी कि अगर किसी की मौत बरसात में या सर्दी या फिर भीषण गर्मी के दौरान होती है तो शव के अंतिम संस्कार के लिए कम से कम टीनशेड की व्यवस्था तो होनी ही चाहिए। ताकि शव को जलाते वक्त पानी व अन्य आपदा से बचाया जा सके। पर इस मंशा को दरकिनार करते हुए जिले के अधिकतर सरपंच-सचिवों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया और नतीजा यह है कि जिले के 596 गांवों में से केवल 165 में ही श्मशान पूरी तरह से बनाए जा सके। बाकी का काम या तो शुरू ही नहीं हुआ या फिर अधूरा पड़ा है।

फैक्ट फाइल
596 गांवों में बनने थे श्मशान घाट
395 गांवों में अभी भी अधूरे हैं श्मशान निर्माण का कार्य
163 गांवों में ही बन सके सुरक्षित घाट
03 माह का दिया था वक्त एक साल भी कम पड़ गया
1.80 लाख रुपए प्रति श्मशान घाट राशि देने का है प्रावधान

नहीं करते मॉनिटरिंग
सूत्रों के मुताबिक इस काम में सरपंच-सचिव की लेतलाली तो सामने आ ही रही है। उस तकनीकी अमले की भी बेरुखी है जिन्हें कार्य की मॉनीटरिंग करने का अधिकार है। अगर वे नियमित रूप से गांवों में चल रहे कार्यों के बारे में पूछताछ करें तो वह दिन दूर नहीं जब काम पूरा होने में देर नहीं लगेगी। हैरानी की बात यह है कि जुलानिया ने इस काम के लिए तीन महीने का वक्त निर्धारित किया था जिसमें टीनशेड के अलावा अन्य कार्य कराना था पर एक साल गुजर जाने के बाद भी अधिकतर गांवों में श्मशान घाट नहीं बन सके।


"जिले के गांवों में श्मशान घाट निर्माण चल तो रहा है पर किस हालत में है। इसके बारे में जल्द ही संबंधित अमले से बात कर उनकी रफ्तार तेज कराता हूं।"
संदीप माकिन, सीईओ, जिला पंचायत