
10 वर्ष बाद ज्वैलर लूट-हत्या मामले में फैसला (फोटो सोर्स : Hardoi Court WhatsApp News Group)
2016 Jeweller Murder Case: वर्ष 2016 में हुई सनसनीखेज लूट और हत्या की वारदात में करीब दस साल बाद अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अपर सत्र न्यायाधीश (प्रथम) कुसुम लता की अदालत ने ज्वैलर रंजीत कुमार तिवारी की गोली मारकर हत्या करने और जेवरात लूटने के मामले में दो आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है, जबकि साक्ष्यों के अभाव में तीसरे आरोपी को बरी कर दिया गया।
न्यायालय ने इस मामले में राजेन्द्र लोध और कन्हैया उर्फ करिया रैदास को दोषी मानते हुए उन्हें आजीवन कारावास और अर्थदंड की सजा सुनाई। वहीं तीसरे आरोपी मानसिंह लोध को पर्याप्त साक्ष्य न मिलने के कारण बरी कर दिया गया। इस फैसले के साथ ही लगभग एक दशक पुराने इस चर्चित मामले में न्यायिक प्रक्रिया पूरी हुई।
अपर जिला शासकीय अधिवक्ता मानवेंद्र सिंह के अनुसार, यह घटना 28 जुलाई 2016 की शाम की है। उस दिन गौसगंज क्षेत्र में स्थित अपनी सर्राफा दुकान बंद करने के बाद ज्वैलर रंजीत कुमार तिवारी मोपेड से अपने घर लौट रहे थे। उनके पास जेवरात से भरा एक बैग भी था, जिसे वे दुकान से घर ले जा रहे थे।
जब वह जेपी इंटर कॉलेज के पास पहुंचे, तभी तीन बाइक सवार बदमाशों ने उनका पीछा किया। बदमाशों ने पीछे से उनकी मोपेड में टक्कर मार दी, जिससे रंजीत तिवारी सड़क पर गिर पड़े। इसके बाद बदमाशों ने उनके हाथ से जेवरात से भरा बैग छीनने का प्रयास किया।
अभियोजन के अनुसार, जब रंजीत तिवारी ने लुटेरों का विरोध किया और बैग बचाने की कोशिश की, तो एक बदमाश ने उनके पेट में गोली मार दी। गोली लगने से वे गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने साहस दिखाते हुए अपनी मोपेड उठाई और कुछ दूरी तक चलाकर अपने एक परिचित के पास पहुंचे।
घायल अवस्था में उन्होंने अपने दोस्त समरजीत सिंह को पूरी घटना के बारे में बताया। इसके बाद उन्हें तत्काल संडीला सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां से हालत गंभीर होने पर उन्हें लखनऊ ट्रॉमा सेंटर रेफर कर दिया गया। ट्रॉमा सेंटर में इलाज के दौरान अगले दिन रंजीत कुमार तिवारी की मौत हो गई। इस घटना से क्षेत्र में सनसनी फैल गई थी और व्यापारियों में भी आक्रोश का माहौल बन गया था।
घटना के बाद मृतक की पत्नी प्रभा देवी ने उसी शाम थाना कासिमपुर में तहरीर देकर अज्ञात बदमाशों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। पुलिस ने शुरू में धारा 394 (लूट के दौरान चोट पहुंचाना) और 307 (हत्या का प्रयास) के तहत मामला दर्ज किया था। हालांकि इलाज के दौरान रंजीत तिवारी की मौत हो जाने के बाद पुलिस ने इस मामले में धारा 302 (हत्या) भी जोड़ दी। इसके बाद पुलिस ने मामले की गंभीरता से जांच शुरू की और आरोपियों की तलाश तेज कर दी।
पुलिस की जांच के दौरान तीन लोगों के नाम सामने आए, जिनमें राजेन्द्र लोध, कन्हैया उर्फ करिया रैदास और मानसिंह लोध शामिल थे। पुलिस ने तीनों को आरोपी बनाते हुए उनके खिलाफ आरोपपत्र अदालत में दाखिल किया। अभियोजन पक्ष ने अदालत में इस मामले को साबित करने के लिए कुल आठ गवाह पेश किए। इनमें मृतक की पत्नी प्रभा देवी, पुत्र नैमिष तिवारी और मृतक के भाई अरविंद कुमार तिवारी की गवाही को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना गया।
मामले की सुनवाई के दौरान पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में पेश की गई। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि रंजीत कुमार तिवारी की मौत फायरआर्म इंजरी के कारण हुए शॉक और अत्यधिक रक्तस्राव (हेमरेज) से हुई थी। इस रिपोर्ट ने अभियोजन पक्ष के उस तर्क को मजबूत किया कि मृतक की मौत गोली लगने के कारण हुई थी।
जांच के दौरान पुलिस ने आरोपियों के पास से महत्वपूर्ण बरामदगी भी की थी। पुलिस ने कन्हैया उर्फ करिया रैदास के पास से अवैध पिस्तौल बरामद की थी। इसके साथ ही मृतक की दुकान का नाम और मोबाइल नंबर अंकित सोने-चांदी के कुछ जेवरात भी बरामद किए गए थे। इसके अलावा राजेन्द्र लोध की निशानदेही पर पुलिस ने नदी और झाड़ियों में छिपाया गया बैग और बाकी जेवरात भी बरामद किए थे। बाद में इन जेवरातों की पहचान मृतक के भाई और अन्य गवाहों ने की, जिससे अभियोजन पक्ष का मामला और मजबूत हो गया।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने बरामदगी को फर्जी बताते हुए आरोपियों को निर्दोष बताने की कोशिश की। हालांकि अदालत ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और गवाहों की गवाही को विश्वसनीय मानते हुए बचाव पक्ष की दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्य और बरामदगी के आधार पर राजेन्द्र लोध और कन्हैया उर्फ करिया रैदास का अपराध सिद्ध होता है।
हालांकि तीसरे आरोपी मानसिंह लोध के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके। उसके पास से कोई जेवरात बरामद नहीं हुए थे और न ही उसके खिलाफ ठोस साक्ष्य अदालत में प्रस्तुत हो सके। इसी आधार पर न्यायालय ने उसे संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
दोष सिद्ध होने के बाद अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए राजेन्द्र लोध और कन्हैया उर्फ करिया रैदास को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। साथ ही दोनों पर 10,000 रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया। अदालत ने यह भी कहा कि यदि अर्थदंड अदा नहीं किया गया तो दोषियों को दो वर्ष का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 394 के तहत दोनों दोषियों को सात वर्ष का कठोर कारावास और 5,000 रुपये का अर्थदंड सुनाया। इसके अलावा धारा 411 के तहत दो वर्ष का साधारण कारावास और 1,000 रुपये का अर्थदंड भी दिया गया। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी सजाएं एक साथ चलेंगी और आरोपियों द्वारा पहले से जेल में बिताई गई अवधि को सजा में समायोजित किया जाएगा।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान आरोपी राजेन्द्र लोध को उन्नाव जेल से और कन्हैया उर्फ करिया रैदास को हरदोई जेल से अदालत में पेश किया गया था। करीब दस वर्षों तक चली सुनवाई के बाद अदालत के इस फैसले से पीड़ित परिवार को न्याय मिलने की उम्मीद जगी है। वहीं यह फैसला समाज में अपराध के खिलाफ कड़ा संदेश देने वाला भी माना जा रहा है।
Updated on:
10 Mar 2026 09:24 am
Published on:
10 Mar 2026 09:21 am
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