
Lysosomal Storage Disorders (photo- gemini ai)
Lysosomal Storage Disorders: कई बार कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं जो सालों तक पकड़ में नहीं आतीं। वजह यह होती है कि उनके लक्षण साफ नहीं होते और लोगों को उनके बारे में ज्यादा जानकारी भी नहीं होती। ऐसी ही एक बीमारी का समूह है लाइसोजोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (Lysosomal Storage Disorders - LSDs)। यह दुर्लभ जेनेटिक बीमारियां होती हैं, जो अगर समय पर पता न चलें तो शरीर के कई अंगों को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा सकती हैं।
डॉक्टरों के मुताबिक यह बीमारी तब होती है जब शरीर में कुछ खास एंजाइम की कमी होती है। ये एंजाइम आमतौर पर शरीर में मौजूद जटिल पदार्थों जैसे लिपिड, ग्लाइकोप्रोटीन और ग्लाइकोजन को तोड़ने का काम करते हैं। लेकिन जब ये एंजाइम ठीक से काम नहीं करते या बिल्कुल नहीं बनते, तो ये पदार्थ कोशिकाओं में जमा होने लगते हैं। धीरे-धीरे यह जमाव शरीर के अलग-अलग अंगों को प्रभावित करने लगता है।
सामान्य स्थिति में शरीर की कोशिकाओं के अंदर मौजूद लाइसोजोम अनचाहे पदार्थों को तोड़कर खत्म कर देते हैं। लेकिन LSDs में एंजाइम की कमी की वजह से यह प्रक्रिया रुक जाती है। इससे शरीर में जहरीले पदार्थ जमा होने लगते हैं और समय के साथ यह लिवर, स्प्लीन, मांसपेशियों, दिल, हड्डियों और नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इस बीमारी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके लक्षण धीरे-धीरे दिखाई देते हैं और हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं। इसी वजह से कई बार इसे पहचानने में काफी समय लग जाता है।
डॉक्टरों के अनुसार भारत में लाइसोजोमल स्टोरेज डिसऑर्डर के कई प्रकार देखे जाते हैं।
गॉशर डिजीज (Gaucher Disease)- यह भारत में सबसे ज्यादा रिपोर्ट होने वाली LSD बीमारी है। इसमें लिवर और स्प्लीन बढ़ जाते हैं। इसके अलावा मरीज को खून की कमी, प्लेटलेट्स कम होना, हड्डियों में दर्द और फ्रैक्चर जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
पोम्पे डिजीज (Pompe Disease)- इस बीमारी में मांसपेशियों में ग्लाइकोजन जमा होने लगता है। बच्चों में दिल का आकार बढ़ सकता है, जबकि बड़े लोगों में मांसपेशियों की कमजोरी और सांस लेने में परेशानी हो सकती है।
म्यूकोपॉलीसैकराइडोसिस (MPS)- यह भी LSD का एक समूह है, जिसमें हड्डियों का आकार बिगड़ सकता है, जोड़ों में जकड़न होती है और चेहरे की बनावट थोड़ी अलग दिखाई दे सकती है।
फैब्री डिजीज (Fabry Disease)- इस बीमारी में हाथ-पैरों में दर्द, त्वचा पर छोटे-छोटे दाग और धीरे-धीरे किडनी व दिल से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।
टे-सैक्स डिजीज (Tay-Sachs Disease)- यह बीमारी मुख्य रूप से नर्वस सिस्टम को प्रभावित करती है और खासतौर पर बच्चों में गंभीर दिमागी क्षति का कारण बन सकती है।
डॉक्टरों का कहना है कि अब इन बीमारियों के इलाज के कुछ विकल्प मौजूद हैं। इनमें एक महत्वपूर्ण इलाज एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी (ERT) है, जिसमें शरीर को वह एंजाइम दिया जाता है जिसकी कमी होती है। अगर इलाज समय पर शुरू हो जाए तो मरीज की स्थिति में काफी सुधार हो सकता है। हालांकि भारत में अभी भी कुछ चुनौतियां हैं जैसे बीमारी की देर से पहचान, इलाज का ज्यादा खर्च, विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी और रेयर डिजीज की जांच की सीमित सुविधाएं।
अगर इन बीमारियों का जल्दी पता चल जाए तो इलाज बेहतर तरीके से किया जा सकता है। इसके लिए नवजात शिशु की जांच, जेनेटिक काउंसलिंग और समय पर मेडिकल जांच बहुत जरूरी मानी जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि लोगों और डॉक्टरों में जागरूकता बढ़ाकर इन दुर्लभ बीमारियों को समय पर पहचानना संभव हो सकता है, जिससे मरीजों को बेहतर जीवन मिल सके।
Updated on:
16 Mar 2026 12:03 pm
Published on:
16 Mar 2026 12:02 pm
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