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पथरीले मैदान पर फीफा के लिए तैयार हो रहे यह देशी फुटबॉलर

कोई बिना जूतों को कर रहा अभ्यास तो लड़कियां हर मुसीबत को पार कर बनी चैंपियन
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होशंगाबाद

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poonam soni

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Updated: 14 Jun 2018, 5:47 PM IST

This footballer is preparing for a fifa world cup

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पूनम सोनी, होशंगाबाद। फीफा वल्र्ड कप गुरुवार से शुरू हो गया। हर फुटबॉलर का सपना होता है कि वह भी वल्र्ड कप खेले। इसी ख्वाब को पूरा करने के लिए नर्मदा नगरी में लड़के और लड़कियां हर मुसीबत से लड़कर तैयारी कर रही हैं। उनका जिद और जुनून ऐसा है कि बिना शूज के पथरीले मैदान फुटबाल को किक मारकर खुद को मजबूत बना रही हैं। इनके जिद और जुनून ने ही उन्हें अब तक नेशनल खिलाड़ी बना दिया है। अब वे वल्र्ड कप का ख्वाब देख रही हैं। एक ने पांच साल की उम्र में ही ठान लिया था कि नेशनल खिलाड़ी बनूंगी तो दूसरी ने लड़कों के साथ खेलकर अपना सपना पूरा किया। एक खिलाड़ी ऐसा भी है, जिसने पथरीले मैदान में बिना जूतों के अभ्यास किया और नेशनल खेला। अब बच्चों के सपने पूरा करने उन्हें खेल की बारीकियां सिखा रहे हैं। यह है नर्मदापुरम के तीन फुटबाल खिलाडिय़ों चित्रा जैसवाल, राधिक मांझी और विजय पुरोहित की कहानी, जो अपनी मेहनत और जिद से इस मुकाम पर पहुंचे।

ऐसे बना फुटबॉल जूनून
चित्रा जैसवाल बताती हैं, 'मैं, पांच साल की थी। फुटबॉल मैच देखकर यह जुनून सवार हुआ। पहली बार बॉल पर किक मारी और यह जुनून कब जिद में बदल गया पता ही नहीं चला। अकेले मैदान में जाकर फुटबाल खेला करती थी। अभ्यास के बाद स्टेट खेलने गई वहां सलेक्शन नही हुआ, तभी कसम खाई की अब नेशनल खेलकर ही मानूगीं।Ó अब चित्रा, १८ साल की है और चार बार नेशनल मैच जीत चुकी हैं। वे पांडीचैरी, कटकउडिसा, तेलंगाना, झारखंड राची में नेशनल मैच खेलने जा चुकी हैं। कहती हैं, पापा की डेथ के बाद मम्मी ने भाई और मुझे क्लेम के पैसो से पढ़ाया और खेलने की हर जरूरते पूरी की। वह अब फुटबॉल को ही अपना लक्ष्य मानकर आगे बढ़ रही है।
लड़कों के बीच रहकर खेला फुटबॉल
जुम्मेराती की राधिका मांझी पिछले ग्यारह सालों से फुटबॉल खेल रही है। इस समय छह नेशनल खेल चुकी हैं। ग्यारह साल उम्र से घर के पास स्थित ग्राउंड में लड़कों के साथ फुटबॉल खेलना सीखा। लड़कों के साथ खेलने पर कई लोगों ने अपत्ति उठाई कि लड़की होकर लड़को के साथ क्यों खेलती हो। लेकिन मां ने कह दिया, जब तक मंै हूं, तब तक तू खेल, कोई कुछ नहीं कहेगा। लेकिन मम्मी और पापा की डेथ के बाद बहुत दिक्कतें होती थी। अब हम मौसी के साथ रहते हैं। उन्होंने भी हम भाई-बहन को पालने के कारण शादी नही की। आज छह नेशनल गोवा, कर्नाटक, चैन्नई, कटक, झारखंड, कोलापुर, जयपूर शहर में खेल चुकी हूं।
जब जूते नहीं होने के कारण मैदान से बाहर निकाला
37 वर्षीय कमल सिंह ठाकुर की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। वे बताते हैं कि 30 साल से फुटबाल खेल रहा हूं। मेरे पिता कृषि विभाग में भृत्य थे। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। पथरीले मैदान पर बिना जूतों के अभ्यास करता था। 14 साल की उम्र में अंडर-14 स्टेट मैच खेलने छिंदवाड़ा गया था, तब जूते नही होने के कारण खेल मैदान से बाहर कर दिया गया। तब ठान लिया कि अब तो खेलकर ही दिखाऊंगा। पढ़ाई छोड़कर एक चश्मे और बेल्ट की दुकान पर काम करने लगा। जो पैसे मिले उससे जूते और टीशर्ट खरीदी फिर मैदान में उतरा। आज आठ स्टेट खेल चुका हूं। अब नर्मदा हॅास्पिटल में इंमरजेंसी एम्बूलेंस टेक्नीशियन का काम करते हैं और ड्यूटी से फ्री होते ही पुलिस ग्राउंड में बच्चों को फुटबॉल सिखाते है।

' मैं, पिछले 27 साल से इसी पत्थर वाले ग्रांउड पर बच्चों को फुटबॉल मैच की तैयारी करा रहा हूं। कई ऐसे गरीब बच्चे हैं, जिनके पास अभ्यास के लिए जूते तक नहीं होते हैं। लेकिन यह बाद में बेहतर खिलाड़ी बनकर नेशनल तक खेले और अपने माता-पिता के साथ शहर का नाम भी रोशन किया।'
विजय पुरोहित, कोच