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हमारे संस्कार, भाषा व संस्कृति जिंदा रहे

आचार्य महेन्द्र सागर सूरि महाराज की राजस्थान पत्रिका के साथ खास बातचीत

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aacharya mahendra sagar suri maharaj

aacharya mahendra sagar suri maharaj

राणेबेन्नूर (हावेरी). हमें धर्म व संस्कृति को बचाना जरूरी है। राष्ट्र की संस्कृति जिंदा रहे। देश प्रेम कम नहीं हो। हमारे संस्कार जीवंत रहने चाहिए। हमारी भाषा बची रहे। आचार्य महेन्द्र सागर सूरि महाराज ने यहां राजस्थान पत्रिका के साथ विशेष बातचीत में संस्कृति एवं संस्कार के साथ ही धर्म, ध्यान, भाषा समेत विभिन्न विषयों पर खुलकर बात की। प्रस्तुत हैं उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

क्या आप मानते हैं कि संस्कारों में गिरावट आई है, इसके लिए कौन जिम्मेदार है?
- संस्कारों में निश्चित ही गिरावट आई है। इसके लिए मीडिया जगत, फिल्मी व पश्चिमी संस्कृति अधिक जिम्मेदार है। जब से टीवी व मोबाइल का चलन बढ़ा है। संस्कृति व संस्कारों का क्षरण अधिक हुआ है। फिल्मों की वजह से हमारी संस्कृति नष्ट हो रही है। हमारा पहनावा बदल चुका है। हमें सचेत रहने की जरूरत है।

संस्कारों को कैसे बचा सकते हैं?
- मौजूदा समय में कई जगहों पर गुरुकुल चल रहे हैं। वे अच्छा कार्य कर रहे है। शिक्षा के साथ संस्कारों पर जोर दे रहे हैं। विभिन्न स्थानों पर चल रही संस्कारशालाओं में जैन संस्कारों पर जोर दिया जा रहा है। साधु-संत तो लगातार प्रयास कर ही रहे हैं।

मौजूदा दौर में एकल परिवारों का चलन बढ़ा है, क्या ऐसे परिवारों को बढ़ावा मिलना चाहिए?
- परिवार तो भरा-पूरा ही अच्छा लगता है। जो संयुक्त परिवार में साथ मिलता है वह एकल परिवार में नहीं। संयुक्त परिवार संबल देता है। बल देता है। सामूहिकता की भावना देता है। संगठन को दर्शाता है। एक-दूसरे का साथ मिलता है, सहारा मिलता है। संयुक्त परिवार में संभालने वाला होता है। संस्कार मिलता है। यह चीजें एकल परिवार में कहां मिलती है।

युवा पीढ़ी को धर्म से कैसे जोड़कर रख सकते हैं?
- युवाओं को लगता है कि धार्मिक बातें बांधने वाली है। युवाओं को स्वतंत्रता अधिक पसंद है। उन्हें सुगमता चाहिए। वे आसानी का जीवन जीना अधिक पसंद करते हैं। बंधन का जीवन उन्हें नहीं चाहिए। युवा पीढ़ी को महापुरुषों के बारे में बताकर उन्हें धर्म से जोडऩे के जतन हो रहे हैं।

मौजूदा दौर में दिखावे की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, क्या इस पर अंकुश लगना चाहिए?
- वर्तमान समय में दिखावा बढ़ा है। एक-दूसरे की हौड़ में यह सब हो रहा है। दिखावा कम से कम हो। हालांकि अब कई जगह दिखावे पर बंदिश लगने लगी है। शादी-ब्याह में बैंड तक वर्जित किए हैं। राजस्थान के जालोर जिले के कई गांवों में दिखावे पर अंकुश के प्रयास रंग ला रहे हैं। यदि साधु-साध्वी तथा श्रावक-श्राविकाएं मिलकर प्रयास करें तो इस पर रोक संभव है।

आज कम उम्र में ही व्यक्ति कई बीमारियों से ग्रसित रहने लगा है, इसकी क्या वजह है?
- पहले लोग घरेलु काम अधिक करते थे। महिलाएं भी खुद अनाज पीसती थी। आजकल लोग आरामपसंद अधिक हो गए हैं। शारीरिक श्रम कम हो गया है। इसी से व्यक्ति कई बीमारियों से झकडऩे लगा है। हमारा खान-पान बदल गया है। सात्विक भोजन कम हो गया है। बदले खान-पान ने बीमारियां बढ़ाईं हैं।

व्यक्ति की चिंताएं बढ़ती जा रही हैं, तनावरहित कैसे जी सकते हैं?
- पहले कम कमाई में गुजर-बसर हो जाता था। फिजुल-खर्च कम था। कम कमाई में भी आराम से घर का खर्च चल जाता था। अब स्थितियां बदली हैं। अब शौक बढ़ गए। साधन बढ़ गए। खर्च बढ़ गए। ऐसे में चिंता बढ़ी है।

श्रावक-श्राविकाएं प्रवचनों को कितना अंगीकार कर पा रहे हैं?
- सभी कुछ सीख लिया जाए, यह संभव भी नहीं। यह जरूर है कि प्रवचन का कुछ न कुछ असर जरूर होता है। यदि प्रवचन के कुछ अंश भी अंगीकार कर यदि जीवन में बदलाव आ जाएं तो यह अच्छी बात है। प्रवचन सुनने के बाद कई श्रावक बुराइयो को छोड़ रहे हैं। प्रवचनों का असर तो किसी न किसी रूप में हो ही रहा है।

श्रावक-श्राविकाओं को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
- हम बुराइयों से बचें। जीवन की मौलिक पवित्रता को बचाए रखें। तभी कल्याण संभव है। दुनियां जहां जा रही है, तो हमें भी समय के साथ चलना जरूरी है, लेकिन अपना सिद्धांत हो। महापुरुषों के दिए उपदेश हम अपने जीवन में उतारने की कोशिश करें। उनके बताए पदचिन्हों पर चलने का प्रयास हो।