
राजस्थान पत्रिका से विशेष बातचीत करते आचार्य दिव्येशचन्द्र सागर।
प्रश्न: बच्चों और युवाओं के लिए आप विशेष शिविर भी चला रहे हैं। इसका उद्देश्य क्या है?
आचार्य दिव्येशचन्द्र सागर: 5 से 20 वर्ष तक के बालकों और युवाओं के लिए प्रत्येक रविवार शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। बच्चों की रुचि और उनकी उम्र के अनुरूप उन्हें जीवन से जुड़ी बातें बताई जाती हैं। केवल धार्मिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि जीवन कैसे जीना है, लक्ष्य क्या होना चाहिए और भविष्य को किस दिशा में ले जाना है—इन विषयों पर भी संवाद किया जाता है। उद्देश्य है कि बच्चे जीवन में सही निर्णय लेने के लिए तैयार हों।
प्रश्न: पर्युषण पर्व के दौरान किस तरह के आयोजन होंगे?
आचार्य दिव्येशचन्द्र सागर: पर्युषण जैन समाज का प्रमुख पर्व है। इस दौरान सुबह 9 से दोपहर 12 बजे तक और दोपहर 3 से शाम 5 बजे तक विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम होंगे। प्रतिक्रमण, चौविहार सहित अनेक धार्मिक आयोजन होंगे। जिनालय में भक्ति और आराधना का वातावरण रहेगा। दोनों समय प्रवचन होंगे तथा कल्पसूत्र का वाचन भी किया जाएगा। यह पर्व आत्मचिंतन और जीवन को भीतर से सुधारने का अवसर देता है।
प्रश्न: क्या जैन धर्म के संदेश से अन्य समाज के लोग भी जुड़ सकते हैं?
आचार्य दिव्येशचन्द्र सागर: निश्चित रूप से। यदि अजैन समाज के लोग भी जैन संतों के संपर्क में आएं और प्रवचन एवं सत्संग सुनें तो अहिंसा, संयम, करुणा और आत्मचिंतन जैसे मूल्यों को अपने जीवन में अपना सकते हैं। जैन धर्म बहुत सूक्ष्म और गहन है। इसके सिद्धांत केवल जैन समाज तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मानव जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा देते हैं।
प्रश्न: आज बच्चों के संस्कारों को लेकर सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
आचार्य दिव्येशचन्द्र सागर: आज बच्चों के सामने सबसे बड़ी चुनौती वातावरण की है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को संस्कार देने के लिए पाठशालाओं और गुरुकुलों से जोड़ें। आज भी विभिन्न शहरों में संघ की ओर से संस्कार पाठशालाएं संचालित की जा रही हैं, जहां बच्चों को नैतिकता और जीवन मूल्यों की शिक्षा दी जाती है। केवल स्कूल की शिक्षा पर्याप्त नहीं है, संस्कारों की शिक्षा भी उतनी ही जरूरी है।
प्रश्न: बच्चों को मोबाइल देने को लेकर आपका क्या मत है?
आचार्य दिव्येशचन्द्र सागर: मोबाइल आज आवश्यकता बन गया है, लेकिन कम उम्र में इसका अत्यधिक उपयोग बच्चों के लिए उचित नहीं है। मेरा मानना है कि बच्चे के परिपक्व होने तक मोबाइल से दूरी रखना बेहतर है। माता-पिता को बच्चों को मोबाइल देने के बजाय उनके साथ समय बिताना चाहिए, उनसे संवाद करना चाहिए और उन्हें खेल, अध्ययन, संस्कार तथा रचनात्मक गतिविधियों से जोडऩा चाहिए।
प्रश्न: खान-पान में आए बदलाव को आप किस तरह देखते हैं?
आचार्य दिव्येशचन्द्र सागर: हमारा खान-पान काफी बदल गया है। आज बाजार और होटल के भोजन पर निर्भरता बढ़ रही है। भोजन की गुणवत्ता और उसमें होने वाले रासायनिक प्रयोगों को लेकर भी चिंता बढ़ी है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए खान-पान में संयम और शुद्धता आवश्यक है। घर का सादा और संतुलित भोजन जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।
प्रश्न: परिवारों में बढ़ते विवाद और तलाक के मामलों को लेकर आपका क्या कहना है?
आचार्य दिव्येशचन्द्र सागर: परिवार में प्रेम, वात्सल्य और एक-दूसरे के प्रति सम्मान कम होने से समस्याएं बढ़ती हैं। पति-पत्नी के रिश्ते में अहंकार का भाव आ जाए तो छोटी-छोटी बातें भी विवाद का कारण बन जाती हैं। पहले संयुक्त परिवारों में एक-दूसरे के सुख-दु:ख में साथ रहने की भावना अधिक थी। परिवार के बड़े-बुजुर्ग बच्चों को संस्कार देते थे। आज एकल परिवारों में संवाद और पारिवारिक मार्गदर्शन कम हुआ है। धन और स्वार्थ को रिश्तों से ऊपर रखने के बजाय प्रेम, त्याग और समझ को महत्व देना चाहिए।
प्रश्न: आज लोग शारीरिक श्रम से भी दूर होते जा रहे हैं।
आचार्य दिव्येशचन्द्र सागर: शरीर भी एक वाहन की तरह है। जिस प्रकार वाहन को चलाने और उसकी देखभाल करने की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार शरीर को भी श्रम और सक्रियता चाहिए। आज घर के छोटे-छोटे काम भी दूसरों के भरोसे छोड़ दिए जाते हैं। इससे शारीरिक श्रम कम हो रहा है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार घर के काम और शारीरिक गतिविधियों में भाग लेना चाहिए।
प्रश्न: आज के समाज में सबसे बड़ा बदलाव क्या दिखाई देता है?
आचार्य दिव्येशचन्द्र सागर: आज स्वार्थ बढ़ा है और वात्सल्य तथा प्रेम कम हुआ है। पहले पति-पत्नी और परिवार के सदस्य सुख-दु:ख में एक-दूसरे के साथ खड़े रहते थे। अब कई बार पैसा और व्यक्तिगत सुविधा रिश्तों पर भारी पड़ जाती है। समाज को फिर से प्रेम, सेवा, त्याग और आत्मीयता की ओर लौटने की आवश्यकता है।
प्रश्न: जैन धर्म के प्रचार-प्रसार को लेकर क्या आवश्यकता महसूस होती है?
आचार्य दिव्येशचन्द्र सागर: जैन धर्म के सिद्धांतों का जितना प्रचार-प्रसार होना चाहिए, उतना अभी नहीं हुआ है। अहिंसा, संयम और करुणा जैसे संदेश पूरे समाज के लिए उपयोगी हैं। इसमें मीडिया की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। मीडिया को विश्वसनीयता बनाए रखते हुए समाज में सकारात्मक और मूल्यपरक संदेश पहुंचाने का कार्य करना चाहिए।
प्रश्न: आपने करीब 36 वर्ष पहले दीक्षा ली। आपकी आध्यात्मिक यात्रा कैसी रही?
आचार्य दिव्येशचन्द्र सागर: मेरा मूल संबंध पश्चिम बंगाल के कोलकाता से है। करीब 36 वर्ष पहले गुजरात के पालीताणा में आचार्य अशोक सागर सूरीश्वर के सान्निध्य में दीक्षा ग्रहण की। इसके बाद से साधना और धर्म के प्रचार-प्रसार की यात्रा निरंतर चल रही है।
प्रश्न: आपकी पदयात्राओं और चातुर्मास की यात्रा भी काफी व्यापक रही है।
आचार्य दिव्येशचन्द्र सागर: प्रत्येक वर्ष करीब 2 से 2.5 हजार किलोमीटर तक पैदल विहार होता है। राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात सहित विभिन्न राज्यों में चातुर्मास करने का अवसर मिला है। मुंबई में कई बार चातुर्मास हुआ। इसके अलावा चेन्नई, बेंगलूरु, अहमदाबाद सहित अनेक शहरों में भी चातुर्मास किया है। यह यात्रा केवल स्थान बदलने की नहीं, बल्कि लोगों तक धर्म, अहिंसा, संयम और संस्कारों का संदेश पहुंचाने की यात्रा है।
Updated on:
01 Sept 2026 06:55 pm
Published on:
01 Sept 2026 06:54 pm
