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हुब्बल्ली में गूंजा गुरु जम्भेश्वर भगवान का संदेश, प्रकृति संरक्षण का लिया संकल्प, समाज की एकता पर दिया जोर

विश्नोई समाज के आराध्य देव गुरु जम्भेश्वर भगवान की 576वीं जन्माष्टमी शुक्रवार को हुब्बल्ली (कर्नाटक) के पास बुदरसिंघी स्थित दक्षिण भारतीय विश्नोई समाज के सामुदायिक भवन में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई गई। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ समाजबंधुओं ने पवित्र पाहल ग्रहण किया और गुरु जम्भेश्वर भगवान के 29 नियमों को जीवन में उतारने, जीव-दया, प्रकृति संरक्षण तथा समाज की एकता को मजबूत करने का संकल्प लिया।
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हुबली

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ASHOK SINGH RAJPUROHIT

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Updated: 4 Sep 2026, 10:06 PM IST

पवित्र पाहल: गुरु जम्भेश्वर भगवान की 576वीं जन्माष्टमी पर बुदरसिंघी स्थित दक्षिण भारतीय विश्नोई समाज भवन में पवित्र पाहल की धार्मिक विधि में श्रद्धापूर्वक शामिल समाजबंधु।

पवित्र पाहल: गुरु जम्भेश्वर भगवान की 576वीं जन्माष्टमी पर बुदरसिंघी स्थित दक्षिण भारतीय विश्नोई समाज भवन में पवित्र पाहल की धार्मिक विधि में श्रद्धापूर्वक शामिल समाजबंधु।

विधि-विधान से पाहल तैयार
समारोह में हुब्बल्ली सहित उत्तर कर्नाटक के विभिन्न क्षेत्रों से विश्नोई समाज के लोग परिवार सहित शामिल हुए। सुबह 120 शब्दों के पाठ के साथ पवित्र पाहल की धार्मिक विधि शुरू हुई। विधि-विधान से पाहल तैयार कर समाजबंधुओं ने श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया। इसके बाद सामाजिक चर्चा हुई, जिसमें गुरु जम्भेश्वर भगवान की शिक्षाओं, समाज की एकता, सामाजिक सरोकारों, पर्यावरण संरक्षण और नई पीढ़ी को संस्कारों से जोडऩे पर विचार-विमर्श किया गया।

भक्ति के साथ प्रकृति और जीवों की रक्षा का संदेश
दक्षिण भारतीय विश्नोई समाज के अध्यक्ष बीरबल एम. विश्नोई ने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि गुरु जम्भेश्वर भगवान ने समाज को केवल भक्ति का मार्ग नहीं दिखाया, बल्कि जीवों के प्रति दया, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, पेड़-पौधों एवं पर्यावरण की रक्षा, सदाचार, संयम और आपसी प्रेम-भाईचारे का संदेश दिया। यही विश्नोई समाज की पहचान और सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि जन्माष्टमी का पाहल केवल धार्मिक आयोजन नहीं है। यह समाजबंधुओं के एक-दूसरे से मिलने, सुख-दुख साझा करने, पुरानी दूरियां मिटाने और बच्चों को समाज की संस्कृति एवं संस्कारों से जोडऩे का अवसर भी है। आज के समय में परिवार और समाज के सामूहिक रूप से मिलने के अवसर कम होते जा रहे हैं। ऐसे में होली मिलन और जन्माष्टमी का पाहल समाज को एक सूत्र में बांधने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

हुब्बल्ली से शुरू हुई दक्षिण भारत में पाहल की परंपरा
बीरबल विश्नोई ने बताया कि दक्षिण भारत में जन्माष्टमी के पाहल की परंपरा की शुरुआत हुब्बल्ली से हुई थी। वर्ष 1994-95 के दौरान दक्षिण भारत में इस तरह के आयोजन बहुत कम देखने को मिलते थे। उस समय हुब्बल्ली से इसकी शुरुआत की गई। आज दक्षिण भारत के विभिन्न शहरों में, जहां विश्नोई समाज के लोग व्यापार, नौकरी और व्यवसाय के सिलसिले में बसे हैं, वहां जन्माष्टमी के पाहल और सामाजिक मिलन के आयोजन होने लगे हैं। उन्होंने समाज के व्यापारियों और युवाओं से एक-दूसरे का सहयोग करने का आह्वान किया। कहा कि किसी समाजबंधु को नया व्यापार शुरू करना हो तो उसका मार्गदर्शन करें। किसी को काम-काज, ग्राहक, संपर्क या अवसर की जरूरत हो तो यथासंभव सहयोग करें। समाज की प्रगति सामूहिक सहयोग से ही संभव है।

पौधरोपण से दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश
बीरबल विश्नोई ने कहा कि गुरु जम्भेश्वर भगवान की शिक्षाओं को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है। पेड़ लगाना, पानी बचाना, जीवों की रक्षा करना और पर्यावरण को सुरक्षित रखना भी गुरु जम्भेश्वर भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा है। उन्होंने बताया कि समाज भवन परिसर में पिछले वर्ष भी पौधरोपण किया गया था और आगे भी अधिक से अधिक पौधे लगाने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ी को केवल भवन नहीं, बल्कि स्वच्छ हवा, सुरक्षित पर्यावरण और अच्छे संस्कार देना भी समाज की जिम्मेदारी है। जन्माष्टमी समारोह में धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक एकता, पर्यावरण संरक्षण और गुरु जम्भेश्वर भगवान की शिक्षाओं को जीवन में अपनाने का संदेश दिया गया। समाजबंधुओं ने इन मूल्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।