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कोई कान्हा बना, कोई राधा… आधुनिक दौर में भी नन्हे कदमों से जीवंत हो रही कृष्ण जन्माष्टमी की परंपरा

राजस्थान पत्रिका ने इसी उत्सव और शहर की इन खूबसूरत यादों को सहेजने के लिए आपके शहर के कृष्ण-राधा अभियान शुरू किया है। पत्रिका को अब तक कृष्ण और राधा के रूप में सजे बच्चों की कई आकर्षक तस्वीरें प्राप्त हो चुकी हैं। अब आपकी तस्वीर का भी इंतजार है। आपके घर का नन्हा कान्हा या प्यारी राधा, मंदिर की खूबसूरत झांकी या जन्माष्टमी के पारंपरिक आयोजन की तस्वीर इस अभियान का हिस्सा बन सकती है। चयनित तस्वीरों को राजस्थान पत्रिका के प्रिंट और डिजिटल संस्करण में प्रकाशित किया जाएगा।
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राधा के रूप में सजी रोशनी, हाथों में सजी माखन की मटकी थामे नन्ही राधा का मनमोहक रूप। सात वर्षीय रोशनी डी. चौधरी मूल रूप से राजस्थान के जालोर जिले के रानीवाड़ा क्षेत्र के करड़ा की निवासी हैं और वर्तमान में हुब्बल्ली में रहती हैं। जन्माष्टमी के रंग में सजी रोशनी ने पारंपरिक वेशभूषा में राधा का रूप धारण कर कृष्ण भक्ति की सुंदर झलक पेश की।

राधा के रूप में सजी रोशनी, हाथों में सजी माखन की मटकी थामे नन्ही राधा का मनमोहक रूप। सात वर्षीय रोशनी डी. चौधरी मूल रूप से राजस्थान के जालोर जिले के रानीवाड़ा क्षेत्र के करड़ा की निवासी हैं और वर्तमान में हुब्बल्ली में रहती हैं। जन्माष्टमी के रंग में सजी रोशनी ने पारंपरिक वेशभूषा में राधा का रूप धारण कर कृष्ण भक्ति की सुंदर झलक पेश की।

कौन-सी तस्वीरें भेज सकते हैं?
कृष्ण या राधा की वेशभूषा में सजे बच्चे
कृष्ण-राधा की आकर्षक झांकियां
मंदिरों में जन्माष्टमी के आयोजन और झांकियां
मटकी फोड़ एवं अन्य पारंपरिक आयोजन
परिवार के साथ जन्माष्टमी की खूबसूरत तस्वीरें
जन्माष्टमी की पुरानी और यादगार तस्वीरें

तस्वीर भेजने की अंतिम समय सीमा
5 सितंबर 2026, शनिवार दोपहर 12 बजे से पहले
व्हाट्सऐप करें
9940318115
तस्वीर के साथ बच्चे का नाम, उम्र और क्षेत्र-शहर का नाम जरूर लिखें।
आपके कैमरे में कैद कृष्ण-राधा की एक तस्वीर केवल एक याद नहीं, बल्कि हमारे शहर की संस्कृति और जन्माष्टमी के उत्सव की पहचान बन सकती है।

आपकी तस्वीर बनेगी शहर की पहचान
मोबाइल और डिजिटल दौर में बचपन भले ही बदल गया हो, लेकिन श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का आकर्षण आज भी बरकरार है। जन्माष्टमी के अवसर पर शहर में कहीं नन्हे कान्हा बांसुरी बजाते नजर आ रहे हैं तो कहीं राधा के रूप में सजी बच्चियों की मासूम मुस्कान मन मोह रही है। घरों से लेकर मंदिरों तक कृष्ण-राधा की वेशभूषा में बच्चों की तस्वीरें इस बात की गवाही दे रही हैं कि आधुनिक दौर में भी हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं नई पीढ़ी से जुड़ रही हैं। जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व है। यह केवल धार्मिक आस्था का अवसर नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति, धर्म और जीवन में सकारात्मकता का संदेश देने वाला पर्व भी है। कृष्ण का बाल रूप बच्चों को सहज रूप से आकर्षित करता है। यही कारण है कि जन्माष्टमी पर माता-पिता अपने बच्चों को कान्हा और राधा की वेशभूषा में सजाकर इस पर्व की खुशियां साझा करते हैं। आज जब बच्चों का अधिक समय मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल मनोरंजन में बीत रहा है, ऐसे आयोजनों का महत्व और बढ़ जाता है। कृष्ण बनकर बच्चा जब मुरली, मोरपंख और पीतांबर धारण करता है या राधा के रूप में सजता है, तो वह केवल एक तस्वीर का हिस्सा नहीं बनता, बल्कि परिवार की परंपरा और संस्कृति से भी जुड़ता है। इन छोटी-छोटी गतिविधियों के माध्यम से अभिभावक बच्चों को भारतीय संस्कृति और त्योहारों की जानकारी देने का प्रयास कर रहे हैं।