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नारियल का बदला रूप, बढ़ी कमाई की राह, तेल-चटनी से आगे बढ़ा इस्तेमाल

हर साल 2 सितंबर को विश्व नारियल दिवस मनाया जाता है। नारियल अब सिर्फ रसोई का हिस्सा नहीं रहा। नारियल पानी, वर्जिन कोकोनट ऑयल, नारियल मिल्क, क्रीम, डेसिकेटेड कोकोनट, कोकोपीट और कोयर जैसे उत्पादों ने इसकी उपयोगिता और बाजार दोनों का दायरा बढ़ा दिया है।
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विश्व नारियल दिवस

विश्व नारियल दिवस

वैल्यू एडिशन से कमाई बढ़ाने की बड़ी संभावना
नारियल के फल, रेशे और खोल तक का इस्तेमाल होने से यह ऐसी फसल बन रही है, जिसमें उत्पादन के साथ वैल्यू एडिशन से कमाई बढ़ाने की बड़ी संभावना है। भारत दुनिया के प्रमुख नारियल उत्पादक देशों में है। देश के उत्पादन में तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश प्रमुख हैं। कर्नाटक में टुमकूरु, मांड्या, हासन, चिक्कमगलूरु और चित्रदुर्ग जैसे जिले नारियल उत्पादन के बड़े केंद्र हैं। ऐसे में नारियल आधारित नए उत्पादों का बढ़ता बाजार राज्य के किसानों के लिए भी महत्वपूर्ण अवसर बन सकता है।

एक नारियल से कई उत्पाद
नारियल पानी की मांग अब केवल स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है। पैकेज्ड नारियल पानी और अन्य पेय बाजार में जगह बना रहे हैं। नारियल के गूदे से मिल्क, क्रीम और डेसिकेटेड कोकोनट तैयार होता है, जबकि सूखे नारियल से कोपरा और तेल बनाया जाता है। वर्जिन कोकोनट ऑयल का इस्तेमाल खाद्य पदार्थों के साथ कॉस्मेटिक्स और पर्सनल केयर उत्पादों में भी हो रहा है। नारियल का रेशा भी आय का जरिया बन रहा है। इससे कोयर रस्सियां, मैट, ब्रश सहित कई उत्पाद तैयार होते हैं। नारियल के खोल से चारकोल और एक्टिवेटेड कार्बन जैसे उत्पाद बनाए जाते हैं, जबकि कोकोपीट आधुनिक बागवानी और नर्सरी में उपयोगी है।

कच्चे नारियल से ज्यादा मूल्यवर्धित उत्पादों में संभावना
नारियल की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव वैल्यू एडिशन का है। किसान यदि कच्चे नारियल को बेचने के साथ स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण से जुड़ते हैं तो एक ही उपज से कई बाजार तैयार किए जा सकते हैं। इससे किसानों की आय के साथ ग्रामीण स्तर पर छोटे उद्योग और रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं। इसी दिशा में नारियल आधारित उत्पादों का निर्यात भी महत्वपूर्ण है। भारत से ताजा और सूखा नारियल, नारियल तेल तथा अन्य उत्पाद संयुक्त अरब अमीरात, अमरीका, ब्रिटेन, नेपाल और बांग्लादेश सहित विभिन्न बाजारों में पहुंच रहे हैं। 2024-25 में नारियल और नारियल आधारित उत्पादों का भारत का निर्यात 4,349 करोड़ से अधिक रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में करीब 25 प्रतिशत अधिक था।

मौसम की मार सबसे बड़ी चुनौती
बाजार बढ़ रहा है, लेकिन उत्पादन मौसम पर निर्भर है। केरल के कोझिकोड और मलप्पुरम में 25 वर्षों के आंकड़ों पर आधारित एक अध्ययन में पाया गया कि जुलाई-सितंबर और अक्टूबर-दिसंबर की अधिक बारिश का नारियल उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। अत्यधिक बारिश से जलभराव, मिट्टी में हवा की कमी और रोग-कीट का प्रकोप बढऩे से फल गिरने और उत्पादन प्रभावित होने की आशंका रहती है।
इसलिए नारियल की बढ़ती मांग के साथ उत्पादन, उत्पादकता और मौसम प्रबंधन तीनों पर ध्यान देना जरूरी होगा।

बाजार किसानों के लिए नई संभावनाएं खोल रहा
नारियल का भविष्य अब केवल अधिक पेड़ लगाने में नहीं, बल्कि हर नारियल से अधिक मूल्य निकालने में है। पानी से लेकर तेल, मिल्क, क्रीम, कोयर और कोकोपीट तक बढ़ते उत्पादों का बाजार किसानों के लिए नई संभावनाएं खोल रहा है। यदि प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और निर्यात को गांव और किसान स्तर से जोड़ा जाए तो नारियल आने वाले वर्षों में केवल फसल नहीं, बल्कि बहुआयामी ग्रामीण कारोबार का आधार बन सकता है।