
खेजड़ली शहादत दिवस के अवसर पर राजस्थान पत्रिका परिचर्चा में पर्यावरण संरक्षण और 363 बलिदानियों की विरासत पर विचार रखते विश्नोई समाज के लोग।
परिचर्चा में वक्ताओं ने कहा कि खेजड़ली का बलिदान अतीत की स्मृति भर नहीं है, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए चेतावनी और प्रेरणा दोनों है। बढ़ते शहरीकरण, पेड़ों की कमी, जल संकट और वन्यजीवों के सामने बढ़ती चुनौतियों के बीच प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। 363 बलिदानियों की स्मृति यह संदेश देती है कि प्रकृति की रक्षा केवल सरकार या किसी एक समाज का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।
दक्षिण भारतीय विश्नोई समाज के अध्यक्ष बीरबल एम. विश्नोई साहू ने कहा कि आज पर्यावरण संरक्षण की चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन व्यवहार में इसका असर सीमित दिखाई देता है। जन्मदिन, विवाह, सामाजिक आयोजन और अन्य अवसरों पर पौधे लगाने की परंपरा शुरू होनी चाहिए, लेकिन इसके साथ उनकी नियमित देखभाल भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि शहरों में बढ़ते निर्माण के कारण हरियाली कम हो रही है। ऐसे में सड़क किनारे, खाली जगहों और संस्थानों के परिसरों में स्थानीय प्रजातियों के पेड़ लगाए जाएं। बच्चों को भी पौधे लगाने और उनकी देखभाल से जोड़ा जाए, ताकि पर्यावरण संरक्षण उनके संस्कारों का हिस्सा बने।
बीरबल विश्नोई ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल पेड़ों को बचाना नहीं है। पेड़, पानी, पशु-पक्षी और पूरी प्रकृति एक-दूसरे से जुड़े हैं। जंगल और हरियाली कम होगी तो वन्यजीवों के सामने भी संकट बढ़ेगा। विश्नोई समाज की परंपरा में हिरण, चिंकारा और अन्य जीव-जंतुओं की रक्षा को विशेष महत्व दिया जाता है। घायल या प्यासे वन्यजीव दिखाई देने पर उनकी सहायता के लिए समाज को आगे आना चाहिए। गर्मी के दिनों में पक्षियों के लिए पानी के परिंडे और पशुओं के लिए पानी की व्यवस्था जैसे छोटे प्रयास भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
परिचर्चा में विश्नोई समाज के लोगों ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण की सोच को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना सबसे बड़ी आवश्यकता है। आज के बच्चे तकनीक और डिजिटल दुनिया से तेजी से जुड़ रहे हैं, लेकिन उन्हें प्रकृति से जोड़ना भी उतना ही जरूरी है। स्कूलों में खेजड़ली बलिदान की कहानी केवल पाठ के रूप में बताने के बजाय पौधरोपण, प्रकृति भ्रमण और जीव-जंतुओं की देखभाल जैसी गतिविधियों से जोड़ा जाना चाहिए। अमृता देवी और 363 बलिदानियों की स्मृति तभी सार्थक होगी, जब समाज पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशील व्यवहार को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाए।
दक्षिण भारतीय विश्नोई समाज के कोषाध्यक्ष लाबूराम साहू चौरा ने कहा कि खेजड़ली का बलिदान हमें सिखाता है कि पेड़ केवल लकड़ी या हरियाली का साधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं। खेजड़ी जैसे पेड़ रेगिस्तानी क्षेत्र में पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के साथ पशु-पक्षियों को भी आश्रय देते हैं। उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर पेड़ों की कटाई बढ़ रही है। ऐसे समय में खेजड़ली के बलिदान को याद करना और भी जरूरी हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में कम से कम कुछ पेड़ों की जिम्मेदारी लेकर उनका संरक्षण करना चाहिए। केवल पौधा लगाना पर्याप्त नहीं है, जब तक वह बड़ा होकर पेड़ न बन जाए, तब तक उसकी देखभाल भी जरूरी है।
परिचर्चा में इस बात पर भी जोर दिया गया कि पर्यावरण संरक्षण को केवल विशेष दिवसों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। जन्मदिन, विवाह, सामाजिक समारोह और अन्य आयोजनों के अवसर पर पौधरोपण को प्रोत्साहित किया जा सकता है। इसके साथ जल संरक्षण, पक्षियों के लिए पानी और जीव-जंतुओं की सुरक्षा जैसे अभियान भी चलाए जा सकते हैं। वक्ताओं ने कहा कि समाज में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता तभी बढ़ेगी, जब इसे सामूहिक प्रयास और सामाजिक संस्कार का रूप दिया जाएगा।
परिचर्चा में उपस्थित विश्नोई समाज के लोगों ने खेजड़ली के 363 बलिदानियों की विरासत को आगे बढ़ाने, अधिक से अधिक पेड़ लगाने और उनकी देखभाल करने के साथ वन्यजीवों की रक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही। उन्होंने कहा कि प्रकृति संरक्षण केवल एक अभियान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य से जुड़ा दायित्व है।
इस अवसर पर मुकेश विश्नोई सारण विरावा, दिनेश सारण जानवी, भूरेश लोळ पूनासर, नरेश साहू चौरा, जयकिशन बेनीवाल करवाड़ा, मानाराम पंवार धमाणा के गोलिया, जगदीश सिंहाग तेंतरोल और चेतन पंवार मालवाड़ा सहित विश्नोई समाज के अन्य गणमान्य लोग मौजूद रहे। उन्होंने अधिकाधिक पौधे लगाने, उनकी देखभाल करने और पर्यावरण संरक्षण को जीवनशैली का हिस्सा बनाने का संदेश दिया।
Updated on:
20 Sept 2026 09:43 pm
Published on:
20 Sept 2026 08:58 pm
