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जनजातीय परंपरा से पूजी जाती हैं माता मालादेवी, मनोकामना पूर्ति के लिए हैं प्रसिद्ध

इस शहर में जनजाति संस्कृति की आत्मा बसती है.....

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Mata Maladevi

इंदौर। महर्षि जाबालि की तपोभूमि जाबालिपुरम में स्थित समस्त सिद्ध देवी मंदिर लोगों की आस्था का केन्द्र हैं। मंदिरों में स्थापित प्राचीन प्रतिमाओं के नाम तो सभी जानते हैं, लेकिन ये बात बहुत कम लोग जानते हैं कि ये किस परंपरा, किस पद्धति और किस संस्कृति का नेतृत्व करती हैं। इतिहासकार डॉ. आनंद सिंह राणा के अनुसार यहां स्थापित देवियां जनजातीय संस्कृति का नेतृत्व करती हैं। वे इसी परंपरा से पूजी जाती हैं। इस शहर में जनजाति संस्कृति की आत्मा बसती है। यही वह नगर है जहां आज भी जनजातीय समाज हिंदू संस्कृति के ऐक्य भाव को समाहित कर मां भगवती की उपासना करते हैं। इनमें शहर के सभी प्रमुख खेरमाई या खेरदाई मंदिर शामिल हैं।

प्रकृति से जुड़ी मूर्ति पूजा

जनजातीय प्रकृति पूजन को प्रधानता देते हैं, इसलिए यहां प्रकृति के तत्वों को मिलाकर मूर्तियां स्थापित की गई हैं। शहर के बड़े प्राचीन मंदिरों की बात करें तो यह कहीं न कहीं गोंड संस्कृति से जुड़े रहे हैं। यही कारण है कि जहां गोंड शासकों ने कुआं, तालाब और बावडिय़ों का निर्माण कर प्रकृति की उपासना की, वहीं मंदिरों का भी जीर्णोद्धार कराकर संरक्षित किया।

1500 साल से मां धूमावती की आराधना

चार खंबा स्थित मां धूमावती मंदिर को बूढ़ी खेरमाई मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यहां लगभग 1500 साल से लोग आराधना कर रहे हैं। खास बात यह है कि यहां बाना चढ़ाने की विशेष परंपरा है। प्रार्थना पूरी होने पर भक्त विशेष रूप से बानों को मां के चरणों में बानों को अर्पण करते हैं।

महालक्ष्मी रुप में हैं मालादेवी

गढ़ा ब्राह्मण मोहल्ला में 1400 साल से है। मालादेवी का पूजन 6वीं शताब्दी से हो रहा है। ये कल्चुरी हैहय चंदेल क्षत्रिय वंश की कुलदेवी हैं। माला देवी भगवती महालक्ष्मी के स्वरूप में हैं। गोंडवंश की महारानी वीरांगना दुर्गावती नियमित रूप से आराधना कर अपने वैभव का आशीर्वाद मांगती थीं। वर्तमान स्थल के सामने राजा शंकर शाह का महल था, राजा शंकर शाह सुबह सबसे पहले भगवती के दर्शन करते थे। पहले मढिय़ा में केवल एक पत्थर और वहां बानों को ही लोग पूजते थे, परन्तु 10वी शताब्दी में पत्थर की मूर्ति मढ़ा दी गई थी। अभी भी वही मूर्ति पूजी जा रही हैं। माला देवी गढ़ा कटंगी के गोंड राजवंश की आराध्य थी अब जनसाधारण की पूज्य देवी हैं।

गोंड शासक ने बनवाया था बड़ी खेरमाई मंदिर

बड़ी खेरमाई मंदिर भानतलैया के बारे में बताया जाता है कि एक बार गोंड राजा मदन शाह मुस्लिम सेनाओं से परास्त होकर यहां खेरमाई मां की शिला के पास बैठ गए। पूजा के बाद उनमें शक्ति मिली और राजा ने मुस्लिम सेना पर आक्रमण कर उन्हें परास्त किया। 500 वर्ष पूर्व गोंड राजा संग्रामशाह ने मढिय़ा की स्थापना कराई थी। शहर अब महानगर हो गया है लेकिन आज भी मां खेरमाई (खेरदाई) का ग्राम देवी के रूप में पूजन किया जाता है।