
राजनीति में वंशवाद : सियासी परिवारों के एकाधिकार से आगे नहीं बढ़ पाए ये दिग्गज नेता
इंदौर. राजनीतिक दलों में वंशवाद और एकाधिकार की राजनीति ने कई दिग्गज नेताओं को आगे नहीं बढऩे दिया। जनता और पार्टी के लिए लंबे समय तक संघर्ष के बाद भी एकाधिकार रखने वाले नेताओं ने टिकट के दावेदारों की राह रोक दी। कई जगह इससे पार्टियों में भी बिखराव सामने आया।
मोतीसिंह पटेल : देपालपुर विधानसभा में मोतीसिंह पटेल बरसों से कांग्रेस की राजनीति कर रहे हैं। दो बार देपालपुर जनपद अध्यक्ष रहे। इंदौर सहकारी दुग्ध संघ का चुनाव भी जीता। वे इंदौर से बोर्ड में अकेले कांग्रेस नेता थे। किसानों के हक के लिए जेल जा चुके पटेल ने विधायक के टिकट की दावेदारी की, लेकिन खाली हाथ रहे।
छोटे यादव : इंदौर पांच में रहने वाले छोटे यादव इंदौर के एकमात्र नेता हैं जो पांच अलग-अलग क्षेत्रों से पार्षद रहे। वे ढाई साल नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष भी रहे। 2003 से विधायक की दावेदारी कर रहे हैं, लेकिन परिवार के कब्जे के चलते हर बार पार्टी ने नजरअंदाज कर दिया। इस सीट पर 2003 से भाजपा जीत रही है।
रतनलाल मालवीय : सोनकच्छ सीट पर कांग्रेस के सज्जनसिंह वर्मा ने एकाधिकार बनाए रखा। 2009 में सांसद बनने के बाद वर्मा ने इस सीट को छोड़ा। तब मालवीय ने स्थानीय नेता होने के नाते दावेदारी जताई थी, लेकिन पार्टी ने वर्मा के करीबी अर्जुन वर्मा को टिकट दिया। 2013 में भी मालवीय को नजरअंदाज कर दिया गया।
अशोक जैन : कभी विक्रम वर्मा के सहयोगी रहे जैन को नगर पालिका अध्यक्ष पद की दावेदारी भी भारी पड़ गई थी। उन्हें पार्टी ने टिकट देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद वे निर्दलीय मैदान में उतर गए थे। हालांकि चुनाव नहीं जीत पाए, लेकिन भाजपा प्रत्याशी हार का सामना करना पड़ा था। जैन की भोपाल दौड़ धार तक ही सीमित रह गई।
कंचनसिंह चौहान: भाजपा के वरिष्ठ नेता और ठाकुर वोटरों में पकड़ रखने वाले कंचनसिंह चौहान महू से टिकट की आस में हैं, पर पार्टी ने वर्षों तक भेरूलाल पाटीदार को टिकट दिया। 2005 में पाटीदार के निधन के बाद 2008 में कैलाश विजयवर्गीय को टिकट दिया गया। चौहान सहकारिता और किसानों के लिए लडऩे वाले नेता रह गए।
शरद पाचुनकर : भाजपा के लिए बरसों संघर्ष करने वाले शरद पाचुनकर देवास सीट से विधायक की दावेदारी करते रहे हैं। देवास के महापौर रहे, लेकिन पार्टी ने टिकट ही नहीं दिया। 2015 के उपचुनाव में उन्होंने देवास में वंशवाद की मुखालफत करते हुए बागी होकर निर्दलीय चुनाव लड़ा। परिवारवाद के चलते मौका नहीं मिल पाया।
प्रभु राठौर : विक्रम वर्मा के धार में एकाधिकार से भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रभु राठौर धार मंडी अध्यक्ष से आगे नहीं बढ़ पाए। राठौर ने भाजपा से टिकट मांगते हुए 2008 में नामांकन दाखिल कर दिया था, उन्हें बाद में टिकट देने की बात कही गई, लेकिन 2013 में भी वंचित किया गया। इससे राठौर की प्रतिभा मंडी तक ही बनी रही।
अनंत अग्रवाल : भाजपा के मुख्य रणनीतिकारों में शामिल रहे अग्रवाल विधायक के लिए दावेदारी करते रहे हैं। एक बार उन्हें नगर पालिका सदस्य के लिए टिकट दिया गया, लेकिन वह हार गए। बाद में पार्टी ने उन पर किसी चुनाव में विश्वास नहीं किया। हालांकि संगठन में बने रहकर सियासी गलियारों में पैठ रखते हैं।
Updated on:
12 Oct 2018 03:00 pm
Published on:
12 Oct 2018 12:13 pm
