
Airtel filed a review petition in the SC on the fine and interest
नई दिल्ली। भारती एयरटेल ( Bharti Airtel ) ने शुक्रवार को एडजेस्टेड ग्रास रेवेन्यू ( Agr ) राशि में जुर्माना व ब्याज की माफी के लिए सुप्रीम कोर्ट ( Supreme Court ) में एक पुनर्विचार याचिका दायर की। सूत्रों ने कहा कि उन्होंने ब्याज व जुर्माने के माफी को लेकर अर्जी दाखिल की है, न कि विस्तार की मांग को लेकर। आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद टेलीकॉम कंपनियों को 90 हजार करोड़ रुपए का झटका लगा था।
एयरटेल ने डाली पुनर्विचार याचिका
पुनर्विचार याचिका फैसले के एक महीने के भीतर दायर की जाती है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला 24 अक्टूबर को दिया था। मूल आदेश के अनुसार, उन्हें 24 जनवरी तक बकाए का भुगतान करना है। एयरटेल का सितंबर में खत्म तिमाही में शुद्ध घाटा 23,900 करोड़ रुपए है। ऐसा एजीआर बकायों से जुड़े 28,450 करोड़ रुपए के प्रोविजनिंग से जुड़े शुल्क के कारण है। अगर वोडाफोन और एयरटेल दोनों के नुकसान की बात करें तो 53,000 करोड़ रुपए के बकाया भुगतान के प्रावधानों से 74,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।
सरकार का 1.47 लाख करोड़ रुपए का बकाया
दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संसद में बुधवार को कहा कि भारती एयरटेल, वोडाफोन आइडिया और अन्य दूरसंचार कंपनियों पर पिछले वैधानिक देय के तौर पर सरकार का 1.47 लाख करोड़ रुपए का बकाया है। उन्होंने कहा कि इस तरह के बकाए पर जुर्माने व ब्याज को माफ करने का कोई प्रस्ताव नहीं है।
किस कंपनी पर कितना बकाया
आंकड़ों की मानें तो भारती एयरटेल 21,682.13 करोड़ रुपए का बकाया है। वहीं वोडाफोन को 19,823.71 करोड़ रुपए चुकाने होंगे। वहीं बंद हो चुकी रिलायंस कम्युनिकेशंस पर 16,456.47 करोड़ रुपए बकाया है। वहीं सरकारी कंपनी बीएसएनएल को 2,098.72 करोड़ रुपए बकाया के तौर पर चुकाने हैं। दूसरी सरकारी कंपनी एमटीएनएल को 2,537.48 करोड़ रुपए चुकाने होंगे। आपको बता दें कि टेलीकॉम डिपार्टमेंट की ओर से जुलाई में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर टेलीकॉम कंपनियों पर बकाया लाइसेंस फीस की जानकारी दी थी। कुल 92,641.61 करोड़ रुपए का बकाया बताया गया था।
कुछ ऐसा है एजीआर विवाद
टेलीकॉम कंपनियों को एजीआर के आधार पर ही सरकार को स्पेक्ट्रम और लाइसेंस फीस चुकानी होती है। कंपनियां अभी टेलीकॉम ट्रिब्यूनल के 2015 के फैसले के आधार पर एजीआर की गणना करती हैं। इसके तहत वे अपने अनुमान के आधार पर स्पेक्ट्रम शुल्क और लाइसेंस फीस चुकाती हैं। दूरसंचार विभाग लगातार बकाया की मांग करता रहा है। दूरसंचार विभाग ने कहा था कि एजीआर में डिविडेंड, हैंडसेट की बिक्री, किराया और कबाड़ की बिक्री भी शामिल होनी चाहिए। टेलीकॉम कंपनियों की दलील थी कि एजीआर में सिर्फ प्रमुख सेवाएं शामिल की जाएं। इस मामले में अदालत ने अगस्त में फैसला सुरक्षित रखा था।
Published on:
23 Nov 2019 12:13 pm
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