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जबलपुर। हिंदी हमारी मातृभाषा है और इसे बढ़ावा देने के लिए हर स्तर पर प्रयास भी हो रहे हैं। वहीं गूगल पर भी भारत में सबसे ज्यादा हिन्दी को ही सर्च किया जाता है। हमारे शहर में हिंदी के साथ-साथ कई अन्य भाषाओं के लोग भी हैं। अपनी मातृभाषा के सम्मान के साथ-साथ अन्य राज्य की भाषा का सम्मान भी बखूबी कर रहे हैं। बहुभाषी होकर विकास की राह आसान बनाई जा सकती है। इस कारण शहर में ऐसे कई लोग हैं, जो हिंदी जानने के साथ-साथ कई अन्य भाषाओं का ज्ञान भी रखते हैं। लोगों का मानना है कि घर के दरवाजे का काम हिंदी करती है, वही घर में शुद्ध हवा के संचार के लिए जो खिड़कियां होती है, वह हमारी अन्य भाषाएं हैं। मातृभाषा दिवस के मौके पर आइए जानते हैं शहर के लोगों ने किस तरह हिंदी के साथ-साथ अन्य भाषाओं को भी अपनाया है।
कई शहरों में मिली पोस्टिंग
कुलजीत सिंह - (भाषा ज्ञान- हिंदी, उर्दू, पंजाबी, बांग्ला, मराठी)
डिफेंस कर्मचारी होने के नाते कुलजीत सिंह को देशभर में कई जगह पोस्टिंग मिली। संगीत से प्रेम होने के कारण उसे भरपूर समय दिया। नौकरी के साथ-साथ संगीत शिक्षा भी ली। हिंदी के अलावा अन्य भाषा भी सीखी। इस तरह बांग्ला, मराठी, पंजाबी, उर्दू भाषा भी सीखने का अवसर मिला। इन भाषाओं में संगीत भी सीखा। खासतौर पर मराठी संगीत अधिक गाया। कई भाषाओं का ज्ञान बहुत मददगार साबित हुआ। जहां भी गए, वहां के रहवासी जल्दी ही दोस्त-यार बन गए।
ननिहाल में सीखी उडिय़ा
प्रियदर्शिनी महापात्रा - (भाषा ज्ञान- ङ्क्षहदी, उडि़या, बांग्ला, तमिल, गुजराती)
प्रियदर्शिनी महापात्रा का ननिहाल ओडिशा में है। हर गर्मी की छुट्टी में उनका वहां जाना होता था। इस कारण प्रियदर्शिनी ने उडिय़ा भाषा भी सीख ली। इसके साथ ही राष्ट्रीय साहसिक शिविर में प्रियदर्शिनी ने मलयालम, तमिल और गुजराती भी सीख ली। प्रियदर्शिनी का कहना है कि इतनी भाषाएं जानने से उन्हें भविष्य में यदि नौकरी का अवसर अन्य राज्यों में मिलता है तो उस जगह पर काम करना उनके लिए आसान होगा, क्योंकि अभी से उन्हें कई तरह की भाषाएं आती हैं।
राष्ट्रीय शिविर ने सिखाई भाषाएं
सुबेंदु मन्ना - (भाषा ज्ञान- हिंदी, मलयाली, बंगाली, गुजराती, तेलुगु)
राष्ट्रीय सेवा योजना से जुडऩे के कारण सुबेंदु मन्ना को कई राष्ट्रीय शिविरों में शामिल होने का मौका मिला। अलग-अलग भाषाओं के स्वयंसेवक मिले। उनके साथ रहकर उन्होंने मलयालम, तेलुगु, गुजराती भाषाएं सीख ली। सुबेंदु बताते हैं कि कई भाषाओं का ज्ञान उनके लिए बेहद लाभदायक रहा। एक बार छत्तीसगढ़ के एक शिविर में गए थे, जहां तमिलनाडू से आए लोगों से बातचीत करने में सभी को परेशानी हो रही थी। सुबेंदु तमिल जानते थे, इस वजह से उन्होंने सबसे बातचीत की और अच्छी दोस्ती भी हो गई।
पढ़ाई के लिए सीख ली तेलुगु भी
अनन्या सिंघई - अनन्या हैदराबाद के एक संस्थान में पढ़ाई कर रही हैं। वहां कुछ समय बिताने के बाद लगा कि हिंदी-अंग्रेजी के अलावा तेलुगु आएगी तो उनके लिए बेहतर होगा। इस वजह से अनन्या ने अपनी शिक्षा के बेहतर भविष्य के लिए तेलुगु भी सीखी। वहां कई दोस्त बन गए हैं, जिनसे तेलुगु सीखने का अवसर मिला। अनन्या बताती है कि अब उन्हें वहां रहने में कोई परेशानी नहीं है। यदि उन्हें उसी राज्य में नौकरी का अवसर मिलता है तो वह आसानी से कर पाएंगी।
Published on:
21 Feb 2018 11:44 am
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