
जयपुर। रामदेवरा में बाबा के भक्तों का सैलाब उमड़ रहा है। हाथों में ध्वज और डीजे की धुन पर नाचते-गाते श्रद्धालु बाबा के दर पहुंच रहे हैं। दरअसल, राजा अजमल और मेणादे के घर जन्मे बाबा रामदेवजी को भगवान विष्णु का अवतार माना गया है। लोकदेवता रामदेवजी अपनी चमत्कारिक शक्तियों के कारण प्रसिद्ध हैं। इसके चलते हरसाल रामदेव मेले का आयोजन होता है।
बाबा रामदेव से यूं कहलाए रामसापीर
बाबा रामदेवजी के चमत्कार की परीक्षा लेने मुल्तान से 5 पीर रूनीचा पहुंचे। इस दौरान रामदेवजी ने 5 पीरों का जोरदार स्वागत किया। जब भोजन कराने के लिए बाबा ने पीरों के लिए जाजम लगाई तो पीरों ने बाबा से कहा कि केवल अपने स्वयं के बर्तनों में ही भोजन करते हैं। दूसरों के बर्तनों में भोजन नहीं करते हैं लेकिन सारे बर्तन मुल्तान में छोड़ आए हैं। इस पर रामदेवजी ने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए उनके बर्तनों को उनके सामने रखकर चमत्कार कर दिया। इसे देखकर पांचों पीरों ने उन्हें दुनिया में रामशापीर, रामपुरी या हिंदवपीर के नाम से पहचाने जाने का आशिर्वाद दिया। तभी से बाबा रामदेवजी को रामसापीर के नाम से जाना जाता है।
रामदेवरा में लगता है लक्खी मेला
रामदेवरा में बाबा रामदेव लक्खी मेला भादो सुदी दोज से शुरू होकर भादो सुदी ग्यारस तक लगता है। यह मेला अगस्त से सितंबर के महीने में भरता है। रामदेवरा मेला में हज़ारों भक्त दूर-दूर से बाबा के दर्शनों को आते हैं। दरअसल, रामदेवरा मेला रुनीचा रामदेवरा में आयोजित होता है।
निम्न वर्ग के लिए लड़ते रहे
बाबा रामदेवजी महाराज ने उच्च और निम्न, अमीर और गरीब की समानता के लिए काफी प्रयास किए थे। रामदेवरा का नाम बाबा रामदेव के नाम पर रखा गया है। मुसलमान भाई रामदेवजी को पीर के नाम से मानते हैं।
नैतलदे से रचाया विवाह
पश्चिम राजस्थान के पोकरण के पास रुणिचा में राजा अजमाल जी के घर भादो शुक्ल पक्ष दोज के दिन विक्रम सम्वत 1409 को बाबा रामदेवजी का जन्म हुआ था। उनका विवाह अमर कोट में नैतलदे के साथ हुआ। बाबा रामसापीर ने ने 1458 ईस्वी में "समाधि" ली।
Published on:
17 Sept 2018 05:26 pm
