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गायब हुआ भेडिया, आखिर कहां गया ?

जयपुर चिडियाघर को आबाद करने वाला भेडिया, अब कहीं किताबों में ही ना रह जाए!

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जयपुर

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Shadab Ahmed

Dec 24, 2017

jaipur

जयपुर। प्रदेश में बाघों के बाद अब भेडिय़ों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। वन विभाग वन्य जीव की इस प्रजाति को संकटग्रस्त और दुर्लभ प्राणी मानता है। वहीं इसकी संख्या में बढ़ोतरी के प्रयास गंभीर नहीं है। यही वजह है कि करीब तीन साल बाद भी नाहरगढ़ में प्रस्तावित भेडिय़ा प्रजनन केन्द्र कागजों से बाहर नहीं आ सका है।

प्रदेश में भेडिय़ों की संख्या एक दशक पहले तक अच्छी खासी थी। यही वजह है कि भेडिय़ों के बदले जयपुर चिडिय़ाघर को कई दुर्लभ वन्यप्राणी मिल चुके हैं। इसके बावजूद भेडिय़ों को संरक्षित करने के प्रयास गंभीर नहीं है। प्रदेश में हर वर्ष वन्य जीव की गणना हो रही है। इसमें साल-दर-साल भेडिय़ों की संख्या में कमी बताई जा रही है। इसको देखते हुए वन विभाग ने नाहरगढ़ में भेडिय़ा प्रजनन केन्द्र बनाने का निर्णय किया। इसके तहत 2014 में इसकी योजना तैयार करवाई गई। करीब तीन साल बाद भी यह योजना फाइल में दबी पड़ी है। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि राज्य की ओर से प्रस्ताव केन्द्रीय चिडिय़ाघर प्राधिकरण को भेजा हुआ है।

इतना कीमती है भेडिय़ा
जयपुर चिडिय़ाघर को भेडि़ए के बदले शेर-शेरनी, बाघ-बाघिन मिल चुके हैं। इनमें वर्ष 2012—13 में जूनागढ़ चिडिय़ाघर से नर भेडिय़ा लाया और मादा भेडिय़ा दिया गया। वर्ष 2013-14 में लखनऊ को एक जोड़ा भेडिय़ा देकर तीन मादा पैंथर, मगरमच्छ, अजगर का जोड़ा, पेंटेड स्टोग, हवासिल लिए। तिरूपति से एक जोड़ा भेडि़ए के बदले सफेद बाघ मिला। इसके बाद भी हैदराबाद, मैसूर और राजकोट चिडि़याघर शेर-बाघ जैसे वन्य जीव भेडिय़ों के बदले देने को तैयार है।

ऐसा होता है भेडिय़ा
भेडि़ए का रंग रेतीला भूरा व काला होता है। इसके सूंघने, सुनने व दौडऩे की शक्ति तीव्र होती है। इसका मुख्य आहार छोटे हिरण, अन्य पशु-पक्षी होते हैं। दुर्लभ एवं संकटग्रस्त वन्य प्राणी है। आयु लगभग 12 वर्ष होती है।

यहां से पूरी तरह लुप्त

वन विभाग की माने तो 2016 की गणना में अलवर, बीकानेर , चुरू, दौसा, डूंगरपुर, गंगानगर, जैसलमेर , प्रतापढ़, राजसमंद, डेजर्ट नेशनल पार्क और माउंट आबू में एक भी भेडिय़ा देखने को नहीं मिला।

जयपुर में घटती-बढ़ती रही संख्या

जयपुर के जंगलों में भेडिय़ों की संख्या गत छह वर्षों के दौरान कभी बड़ी तो कभी घटती रही है। हालांकि सौ से अधिक संख्या सिर्फ 2013 में ही पहुंची।