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निशुल्क दवा का दावा फेल: जयपुर के सरकारी अस्पतालों में 30% दवाइयां आउट ऑफ स्टॉक, सिस्टम की कमी से ‘लपके’ मालामाल

सरकारी अस्पतालों में दवाओं की कमी मरीजों पर भारी पड़ रही है। कई अस्पतालों में 30 प्रतिशत तक दवाइयां आउट ऑफ स्टॉक हैं। लोकल परचेज की जानकारी न होने से मरीज भटकते हैं, तभी दवा काउंटरों के आसपास सक्रिय ‘लपके’ उन्हें निजी मेडिकल दुकानों तक लपककर ले जाते हैं।

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जयपुर

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Arvind Rao

Jan 27, 2026

Free Medicine Claim Fails 30 percentage Drugs Out of Stock in Jaipur Govt Hospitals

दवा काउंटरों के आस-पास सक्रिय ‘लपकों’ की मंडी (फोटो- पत्रिका)

Jaipur News: राजधानी जयपुर के सरकारी अस्पतालों में मरीज इलाज के लिए कतार में खड़ा होता है। लेकिन दवा काउंटर तक पहुंचते-पहुंचते उसका भरोसा टूट जाता है। मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना के तहत मुफ्त दवा का दावा किया जाता है, पर हकीकत यह है कि अधिकांश मरीजों को पूरी दवा एक ही काउंटर से नहीं मिल पा रही। डॉक्टर की पर्ची पर लिखी तीन दवाओं में से कुछ उपलब्ध होती हैं, बाकी के लिए अनुपलब्ध बता दिया जाता है।

सरकारी अस्पतालों में निशुल्क दवा योजना के बावजूद इनके आसपास निजी दवा कारोबार पनपने के कारणों की पड़ताल में सामने आया कि अनुपलब्ध दवा पर अस्पताल की जिम्मेदारी है कि वह लोकल परचेज से वह मरीज को उपलब्ध करवाए। लेकिन मरीजों को इसकी जानकारी नहीं दी जाती और न ही इसके काउंटर की कोई उचित व्यवस्था है।

अस्पताल सूत्रों के अनुसार, जयपुर के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में हर महीने 25 से 35 प्रतिशत आवश्यक दवाइयां अस्थायी रूप से आउट ऑफ स्टॉक रहती हैं। स्टॉक खत्म होने की स्थिति में अस्पताल प्रशासन लोकल परचेज से दवा उपलब्ध कराने की बात कहता है। लेकिन इसकी प्रक्रिया धीमी और जटिल होने के कारण मरीज को तत्काल राहत नहीं मिलती।

लपके बनाते हैं मजबूरी को मौका

इसी बीच अस्पताल परिसरों में सक्रिय ‘लपके’ मरीजों की मजबूरी को मौका बना लेते हैं। काउंटर से लौटते ही मरीज या उसके परिजन को रोककर कहा जाता है…“सरकारी दवा यहीं नहीं मिलेगी, बाहर पास की नि:शुल्क दवा दुकान या मेडिकल स्टोर पर चलिए।”

कई मामलों में मरीजों को सीधे निजी मेडिकल स्टोर पर पहुंचाया जाता है। जहां वही दवा बाजार दर पर खरीदनी पड़ती है। मरीजों का कहना है कि कई बार एक सप्ताह की दवा पर 300 से 500 रुपए तक खर्च हो जाते हैं, जो योजना के उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत है।

अधिकारी सिर्फ निर्देश देते हैं

स्वास्थ्य विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। अधिकारी समय-समय पर दवा उपलब्धता को लेकर निर्देश जारी कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई पर नजर नहीं रखते।

दवा काउंटर पर क्या स्थिति है, कितने मरीज अधूरी दवा लेकर लौट रहे हैं। इसका कोई सार्वजनिक आंकड़ा या नियमित ऑडिट सामने नहीं आता। हाल ही में विभाग के निदेशक जनस्वास्थ्य ने बाहर की दवा लिखने पर कागजी सख्ती का आदेश दिया।

होना यह चाहिए

-डिजिटल स्टॉक मैनेजमेंट सिस्टम को सभी अस्पतालों में सख्ती से लागू किया जाए।
-दवाइयों की रियल-टाइम मॉनिटरिंग हो
-अस्पताल परिसरों में दलालों और लपकों पर सख्त कार्रवाई
-मरीजों के लिए स्पष्ट सूचना बोर्ड व हेल्प डेस्क