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Rajasthan Gravel : खुशखबर, बजरी का नया विकल्प बना एम-सैंड, राजस्थान की सरकारी परियोजनाओं में उपयोग हुआ अनिवार्य

Rajasthan Gravel : खुशखबर, राजस्थान में बजरी का नया विकल्प बना एम-सैंड। सरकारी परियोजनाओं में एम-सैंड का 25 फीसदी उपयोग अनिवार्य किया गया है। बजरी के नए विकल्प की वजह से जहां नदियों पर दबाव घटा है वहीं पर्यावरण सुधार के भी संकेत मिल रहे हैं। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

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Good News Rajasthan M-Sand becomes new alternative to gravel government projects use mandatory

ग्राफिक्स फोटो पत्रिका

Rajasthan Gravel : राजस्थान में नदियों से होने वाले बजरी खनन पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के बीच एम-सैंड विकल्प के रूप में तेजी से उभर रही है। भवन एवं अन्य निर्माण क्षेत्रों में इसके उपयोग में बढ़ोतरी से न सिर्फ नदियों पर दबाव घटा है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन में सुधार के संकेत भी मिलने लगे हैं। विशेषज्ञ इसे सकारात्मक कदम मानते हैं, हालांकि उनका कहना है कि वास्तविक प्रभाव आने वाले वर्षों में ही स्पष्ट होगा, क्योंकि फिलहाल उत्पादन कुल मांग का छोटा हिस्सा ही पूरा कर पा रहा है।

जयपुर-भरतपुर जिले सबसे अधिक यूनिट वाले क्षेत्र बने

राजस्थान में बजरी की वार्षिक मांग 70 से 80 मिलियन टन तक पहुंच रही है, जबकि एम-सैंड का उत्पादन अभी लगभग 15 मिलियन टन है, जो कुल आवश्यकता का करीब 19-20 फीसदी हिस्सा है। फिलहाल राज्य में लगभग 100 एम-सैंड यूनिट कार्यरत हैं, जबकि 25 से 30 नई यूनिटें शुरू होने की तैयारी में हैं। जयपुर और भरतपुर जिले सबसे अधिक यूनिट वाले क्षेत्र बन चुके हैं।

प्रत्येक जिले में पांच-पांच प्लॉट चिन्हित

खान विभाग ने एम-सैंड को बढ़ावा देने के लिए प्रत्येक जिले में पांच-पांच प्लॉट चिन्हित किए हैं, जिनमें से लगभग 50 प्लॉट की नीलामी हो चुकी है। यहां जल्द नई यूनिटें स्थापित होंगी। निर्माण क्षेत्र में भी इसके उपयोग को बढ़ाने की कवायद चल रही है। सरकारी परियोजनाओं में वर्तमान में 25 फीसदी एम-सैंड का उपयोग अनिवार्य है, जिसे नई नीति में बढ़ाकर 50 फीसदी करने की तैयारी है।

एम-सैंड की वर्तमान स्थिति

70-80 मिलियन टन बजरी की वार्षिक मांग।
15 मिलियन टन एम-सैंड का वार्षिक उत्पादन।
100 यूनिट संचालित।
25-30 नई यूनिटों की तैयारी।
03 करोड़ रुपए तक एक यूनिट पर लागत।

बजरी की तुलना में आधी कीमत

बाजार में एम-सैंड नदियों की बजरी की तुलना में लगभग आधी कीमत पर उपलब्ध है, जिससे निर्माण लागत में कमी आने की संभावना है। हालांकि कुछ तकनीकी चुनौतियां और गुणवत्ता नियंत्रण से जुड़े सवाल अब भी बने हुए हैं, जिन पर और काम करने की आवश्यकता है।

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