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राजस्थान में आखिर क्यों घूस ले रहे SDM स्तर के अफसर? जानिए सरकार से कितनी मिलती है सैलरी?

राजस्थान में ऊंचे ओहदे और लाखों की सैलरी के बावजूद SDM स्तर के अधिकारियों का घूसखोरी में फंसना एक चिंताजनक ट्रेंड बन गया है। आखिर प्रतिष्ठा और विलासिता के बीच कहाँ चूक रहे हैं ये 'प्रशासन के रक्षक', इसी का पूरा विश्लेषण यहाँ दिया गया है।

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AI PIC

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राजस्थान की सबसे प्रतिष्ठित सेवा 'राजस्थान प्रशासनिक सेवा' (RAS) एक बार फिर दागदार हुई है। करौली के नादौती में एसडीएम काजल मीणा की गिरफ्तारी ने न केवल सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति पर मुहर लगाई है, बल्कि उन युवाओं के सपनों को भी झकझोर दिया है जो इन अफसरों को अपना आदर्श मानते थे। हैरानी की बात यह है कि एक एसडीएम को मिलने वाला वेतन और सुविधाएं किसी भी शानदार जीवन के लिए पर्याप्त हैं, फिर भी चंद रुपयों की खातिर कुछ अधिकारी अपना करियर और इज्जत दांव पर लगा रहे हैं।

'घूसकांड' की काली फेहरिस्त

राजस्थान में पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े अधिकारी एसीबी के हत्थे चढ़े हैं:

काजल मीणा (2026): नादौती (करौली) उपखंड कार्यालय में ₹60,000 की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ी गईं। एक परिवादी से उसकी भूमि के अंतिम डिक्री (बंटवारे/तकासमा) जारी करने के बदले रिश्वत मांगी गई थी। उनके कार्यालय से ₹4 लाख की अतिरिक्त "संदिग्ध" नकदी भी बरामद हुई। साथ में रीडर और वरिष्ठ सहायक को भी गिरफ्तार किया गया।

दौसा घूसकांड (2021): दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे निर्माण कंपनी से पैसे मांगने के आरोप में पिंकी मीणा और पुष्कर मित्तल की गिरफ्तारी ने पूरे देश में सुर्खियां बटोरी थीं।


बंशीधर योगी (2024): खेतड़ी में ₹2 लाख और एक 'डिनर सेट' लेते पकड़े गए। इन्होंने तो पहले रिश्वत में जमीन ही मांग ली थी।

डीग एसडीएम देवी सिंह (2025): जमीन पर स्टे दिलाने के नाम पर ₹80,000 की रिश्वत लेते पकड़े गए।

लाखों की सैलरी और शाही सुविधाएं: फिर भी क्यों है 'लालच'?

एक SDM का पद राजस्थान में पावर का केंद्र होता है। 7वें वेतन आयोग के अनुसार, इनकी आर्थिक स्थिति काफी मजबूत होती है।

  • सैलरी का गणित: लेवल-14 के तहत एक एसडीएम का प्रारंभिक मूल वेतन ₹56,100 होता है। भत्ते (DA, HRA) मिलाकर इनकी ग्रॉस सैलरी ₹91,000 से ₹1,00,000 तक पहुँचती है।
  • शाही ठाठ-बाठ: रहने के लिए सरकारी बंगला, घूमने के लिए आधिकारिक वाहन और ड्राइवर, घर और ऑफिस के लिए चपरासी, गार्ड और सुरक्षा के लिए गनर। इन सुविधाओं पर होने वाला खर्च अगर जोड़ा जाए, तो यह किसी कॉर्पोरेट मैनेजर के ₹2 लाख के पैकेज से भी अधिक बैठता है।

काजल मीणा केस: टॉपर से 'ट्रैप' तक का सफर

2024 बैच की टॉपर और IIT मण्डी की पूर्व छात्रा काजल मीणा का केस सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है।

  • क्या था मामला? 16 अप्रैल 2026 को उन्हें ₹60,000 की घूस लेते रंगे हाथ पकड़ा गया। यह घूस एक साधारण 'जमीन बंटवारे की डिक्री' जारी करने के लिए मांगी गई थी।
  • दागदार विदाई: काजल के साथ उनके रीडर और सहायक भी धरे गए। उनके दफ्तर से ₹4 लाख की अतिरिक्त संदिग्ध नकदी मिलना यह बताता है कि यह 'सिस्टम' का हिस्सा बन चुका था।

भ्रष्टाचार का मोडस ऑपेरंडी: कैसे होता है खेल?

इन मामलों के विश्लेषण से पता चलता है कि भ्रष्टाचार का एक सेट पैटर्न है:

  • बिचौलिए का रोल: साहब खुद हाथ काले नहीं करते, बल्कि 'रीडर' या 'अतिरिक्त प्रशासनिक अधिकारी' के जरिए सौदेबाजी होती है।
  • जमीन और स्टे: सबसे ज्यादा घूसखोरी जमीन से जुड़े न्यायिक मामलों (Revenue Courts) में होती है, जहाँ एसडीएम के पास निर्णायक पावर होती है।
  • विकास योजनाएं: हाईवे या बड़े प्रोजेक्ट्स में ठेकेदारों को 'अड़ंगा' लगाकर परेशान करना और फिर समझौते के नाम पर उगाही।

समाज और सिस्टम पर चोट

जब काजल मीणा जैसी 'रोल मॉडल' घूसखोरी में फंसती हैं, तो यह प्रशासनिक ढांचे के नैतिक पतन को दर्शाता है। लाखों रुपये वेतन, समाज में असीमित सम्मान और वीवीआईपी सुविधाओं के बाद भी '60 हजार' या '2 लाख' के लिए ईमान बेचना यह साबित करता है कि समस्या पैसे की कमी नहीं, बल्कि 'मानसिक लालच' की है।