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हाईकोर्ट के निर्देश अनाथ बच्चों को हॉस्टल-स्कूल में रखने के लिए जरुरी है पंजीयन

हाईकोर्ट ने कहा, कार्रवाई में हो विशेष किशोर पुलिस इकाई
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जयपुर . हाईकोर्ट ने कोटा की इम्मानुअल सोसायटी के हॉस्टल में बेसहारा बच्चे रखने को अवैध ठहराते हुए कहा है कि अनाथ और बेसहारा बच्चों को हॉस्टल या स्कूल में रखने के लिए बाल कल्याण समिति में पंजीयन कराना अनिवार्य है। साथ ही, एेसे हॉस्टल या स्कूल पर कार्रवाई को लेकर स्पष्ट किया है कि पुलिस का सहयोग लिया जा सकता है, लेकिन वह बाल कल्याण पुलिस अधिकारी या विशेष किशोर पुलिस इकाई ही होनी चाहिए।

न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा ने इम्मानुअल अनाथालय सोसायटी, इम्मानुअल स्कूल सोसायटी, इम्मानुअल बाइबल इंस्टीट्यूट सोसायटी, इम्मानुअल मिशन चिकित्सालय सोसायटी व अन्य की दो याचिकाओं खारिज करते हुए बुधवार को यह आदेश दिया। प्रार्थीपक्ष की ओर से कहा गया कि सोसायटी की ओर से किशोर गृह चलाने के लिए आवेदन किया गया, लेकिन पंजीयन नहीं होने से जून २०१६ में किशोर गृह व अनाथाश्रम बंद करना पड़ा। जीवन आशा बालिका समिति किशोर गृह चला रही है और इसका सोसायटी से कोई सम्बन्ध नहीं है।

जनवरी २०१८ में बाल कल्याण समिति व बाल अधिकारिता विभाग की टीम ने निरीक्षण के नाम पर याचिकाकर्ता सोसायटी के परिसर में छापा मारकर रिकॉर्ड जब्त कर लिया। याचिकाकर्ता का आरोप था कि दस्तावेज पंजीयन निरस्त करने को लेकर चल रहे वाद से सम्बंध रखते है। बाल कल्याण समिति व राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर डी रस्तोगी व अतिरिक्त महाधिवक्ता जी एस गिल ने कहा कि बाल कल्याण समिति को बेसहारा बच्चों के लिए चल रही संस्था के निरीक्षण का अधिकार है। किशोर गृह व अनाथालय बंद करने का प्रस्ताव सिर्फ दिखावा व बनावटी है।

यह भी कहा कोर्ट ने

- इम्मानुअल के हॉस्टल के बच्चों को तत्काल किशोर गृह में भेजा जाए
- बिना कानूनी प्रक्रिया पूरी किए हॉस्टल चलाने की अनुमति नहीं
- बाल कल्याण समिति १५ दिन में कार्रवाई पूरी करे
- संस्था को पंजीयन के लिए पुन: आवेदन की छूट
- दस्तावेज किशोर गृह से सम्बन्धित नहीं, तो लौटा दें

पंजीयन के लिए बाध्य

कोर्ट ने कहा कि १८ साल से कम उम्र के बेसहारा बच्चों के लिए चल रहे हॉस्टल, स्कूल या अन्य संस्था किशोर न्याय अधिनियम के तहत पंजीकरण कराने के लिए बाध्य हैं।

पहले भी कार्रवाई

कोटा की इम्मानुअल मिशन संस्था का पहले सरकार ने पंजीयन निरस्त कर दिया था, उसका मामला भी हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। उसमें भी बच्चों को रखा जाता था।