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हिंगलाज माता की मुसलमान भी करते उपासना

पाकिस्तान के बलूचिस्तान(Baluchistan-Pakistan) में हिन्दुओं का आस्था केंद्र नानी का हज(Nani Ka Haj) यानी माता हिंगलाज(Hinglaj Mata) की मुसलमान भी उपासना एवं पूजा करते (Muslims also worship) हैं। कुल 51 शक्तिपीठों(Shakti Peeth) में से एक हिंगलाज शक्तिपीठ पश्चिमी राजस्थान के हिंदुओ की आस्था का केंद्र(Center of faith) है।

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हिंगलाज माता की मुसलमान भी करते उपासना

हिंगलाज माता की मुसलमान भी करते उपासना

-पाकिस्तान के बलूचिस्तान में हिंदुओं का आस्था केंद्र

-नानी का हज नाम से भी हैं जानते

-कुल 51 शक्तिपीठों में से एक

-क्षत्रिय समाज की कुल देवी

-यात्रा के लिए पासपोर्ट तथा वीजा जरूरी


जैसलमेर। पाकिस्तान के बलूचिस्तान(Baluchistan-Pakistan) में हिन्दुओं का आस्था केंद्र नानी का हज(Nani Ka Haj) यानी माता हिंगलाज(Hinglaj Mata) की मुसलमान भी उपासना एवं पूजा करते (Muslims also worship) हैं। कुल 51 शक्तिपीठों(Shakti Peeth) में से एक हिंगलाज शक्तिपीठ पश्चिमी राजस्थान के हिंदुओ की आस्था का केंद्र(Center of faith) है। मुसलमान हिंगगुला देवी को नानी तथा वहां की यात्रा को नानी का हज कहते हैं। पूरे बलूचिस्तान के मुसलमान भी इनकी उपासना एवं पूजा करते हैं। हिंगलाज देवी की यात्रा के लिए पासपोर्ट तथा वीजा जरूरी है।

-पुराणों के अनुसार पावन तीर्थ

पुराणों के अनुसार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आया। ये अत्यंत पावन तीर्थ कहलाए। ये तीर्थ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर फैले हुए हैं। हिंगलाज की यात्रा कराची से 10 किलोमीटर दूर हॉव नदी से शुरू होती है।

-दर्शन से पुनर्जन्म कष्ट नहीं

हिंगलाज जाने के पहले लासबेला में माता की मूर्ति का दर्शन करना होता है। यह दर्शन छड़ीदार (पुरोहित) कराते हैं। वहां से शिवकुंड (चंद्रकूप) जाते हैं, जहां अपने पाप की घोषणा कर नारियल चढ़ाते हैं। जिनकी पाप मुक्ति हो गई और दरबार की आज्ञा मिल गई, उनका नारियल तथा भेंट स्वीकार हो जाती है, वरना नारियल वापस लौट आता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि हिंगलाज माता के दर्शन से पुनर्जन्म कष्ट नहीं भोगना पड़ता है।

-सती का ब्रह्मरंध्र गिरा

बृहन्नील तंत्रानुसार यहां सती का ब्रह्मरंध्र गिरा था। हिंगलाज को आग्नेय शक्तिपीठ तीर्थ भी कहते हैं, क्योंकि वहां जाने से पूर्व अग्नि उगलते चंद्रकूप पर यात्री को जोर-जोर से अपने गुप्त पापों का विवरण देना पड़ता है तथा भविष्य में उसकी पुनरावृत्ति न करने का वचन भी देना पड़ता है। इसके बाद चंद्रकूप दरबार की आज्ञा मिलती है।

-चंद्रकूप भाप उगलता ज्वालामुखी

चंद्रकूप तीर्थ पहाडिय़ों के बीच में धूम्र उगलता एक ऊंचा पहाड़ है। वहां विशाल बुलबुले उठते रहते हैं। आग तो नहीं दिखती,लेकिन अंदर से यह खौलता, भाप उगलता ज्वालामुखी है। देवी के शक्तिपीठों में कामाख्या, कांची, त्रिपुरा, ङ्क्षहगलाज प्रमुख शक्तिपीठ हैं। हिंगुला का अर्थ सिन्दूर है। हिंगलाज क्षत्रिय समाज की कुल देवी हैं।

-ब्रह्मक्षत्रिय कहकर दिया अभयदान

कहते हैं, जब 21 बार क्षत्रियों का संहार कर परशुराम आए, तब बचे राजागण माता हिंगलाज देवी की शरण में गए और अपनी रक्षा की याचना की, तब मां ने उन्हें ब्रह्मक्षत्रिय कहकर अभयदान दिया। मां के मंदिर के नीचे अघोर नदी है।

-भगवान राम को ब्रह्महत्या से यहीं मिली मुक्ति

कहते हैं कि रावण वध के पश्चात ऋषियों ने राम से ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति के लिए हिंगलाज में यज्ञ करके कबूतरों को दाना चुगाने को कहा। श्रीराम ने वैसे ही किया। उन्होंने ग्वार के दाने हिंगोस नदी में डाले। वे दाने ठूमरा बनकर उभरे, तब उन्हें ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति मिली। वे दाने आज भी यात्री वहां से जमा करके ले जाते हैं।

-सूर्योदय से पूर्व अघोर नदी में स्नान

मां की गुफा के अंतिम पड़ाव पर पहुंच कर यात्री विश्राम करते हैं। अगले दिन सूर्योदय से पूर्व अघोर नदी में स्नान करके पूजन सामग्री लेकर दर्शन हेतु जाते हैं। नदी के पार पहाड़ी पर माँ की गुफा है। गुफा के पास ही अतिमानवीय शिल्प-कौशल का नमूना माता हिंगलाज का महल है, जो यज्ञों द्वारा निर्मित माना जाता है। एक नितांत रहस्यमय नगर जो प्रतीत होता है, मानो पहाड़ को पिघलाकर बनाया गया हो। हवा नहीं, प्रकाश नही, परंतु रंगीन पत्थर लटकते हैं। वहां के फर्श भी रंग-बिरंगे हैं। दो पहाडिय़ों के बीच रेतीली पगडंडी। कहीं खजूर के वृक्ष, तो कही झाडिय़ों के बीच पानी का सोता। उसके पार ही है मां की गुफा।

-अप्रेल में धार्मिक महोत्सव

सचमुच मां की अपरंपार कृपा से भक्त वहां पहुंचते हैं। कुछ सीढिय़ां चढ़कर, गुफा का द्वार आता है तथा विशालकाय गुफा के अंतिम छोर पर वेदी पर दिया जलता रहता है। वहां पिंडी देखकर सहज ही वैष्णो देवी की स्मृति आ जाती है। गुफा के दो ओर दीवार बनाकर उसे एक संरक्षित रूप दे दिया गया है। मां की गुफा के बाहर विशाल शिलाखंड पर सूर्य-चंद्र की आकृतियां अंकित हैं। कहते हैं कि ये आकृतियां राम ने यहां यज्ञ के पश्चात स्वयं अंकित किया था। यहां प्रतिवर्ष अप्रेल में धार्मिक महोत्सव का आयोजन होता है, जिसमें दूरदराज के इलाके से लोग आते हैं।