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JJM घोटाला : रिटायर्ड आइएएस सुबोध अग्रवाल का बड़ा दांव, सुधांश पंत की बढ़ाई मुश्किलें

जेजेएम घोटाले में फंसने के बाद पूर्व आइएएस सुबोध अग्रवाल ने पूर्व मुख्य सचिव सुधांश पंत का नाम लिया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि जिन टेंडरों पर सवाल खड़े हो रहे हैं, उनमें से 90 फीसदी सुधांश पंत के समय के हैं।

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जयपुर

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Kamal Mishra

Feb 20, 2026

Sudhansh Pant troubles

सुबोध अग्रवाल और सुधांश पंत (फाइल फोटो)

जयपुर। राजस्थान में जल जीवन मिशन (JJM) से जुड़े कथित 960 करोड़ रुपये के घोटाले ने अब नया मोड़ ले लिया है। इस मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की कार्रवाई के बीच पूर्व आईएएस अधिकारी सुबोध अग्रवाल ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर पूर्व मुख्य सचिव सुधांश पंत की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। अग्रवाल का दावा है कि टेंडर प्रक्रिया का बड़ा हिस्सा पंत के कार्यकाल में संपन्न हुआ, जबकि उन्हें बलि का बकरा बनाया जा रहा है।

याचिका में अग्रवाल ने कहा है कि जिन दो फर्मों- गणपति और श्याम ट्यूबवेल पर फर्जी अनुभव प्रमाण पत्रों के आधार पर टेंडर हासिल करने का आरोप है, उन्हें अधिकांश वर्कऑर्डर उस समय जारी किए गए जब वित्त समिति की अध्यक्षता सुधांश पंत कर रहे थे।

जांच के दायरे पर सवाल

अग्रवाल के अनुसार, कुल वर्कऑर्डरों में से लगभग 95 प्रतिशत पंत के कार्यकाल में दिए गए, जबकि उनके अपने कार्यकाल में स्वीकृत टेंडरों की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से भी कम थी। ऐसे में उन्होंने जांच एजेंसी की कार्रवाई को पक्षपातपूर्ण बताते हुए कहा है कि जांच का दायरा केवल उनके कार्यकाल तक सीमित रखना उचित नहीं है।

अग्रवाल बोले- मैंने शुरू की कार्रवाई

अग्रवाल ने कोर्ट में यह भी कहा कि वे घोटाले के सूत्रधार नहीं, बल्कि अनियमितताओं को सामने लाने वाले अधिकारी रहे हैं। उनका कहना है कि जैसे ही आईआरकॉन से फर्जी दस्तावेजों की जानकारी मिली, उन्होंने उच्चस्तरीय समिति गठित कर मामले की जांच कराई। उनकी पहल पर संबंधित फर्मों को ब्लैकलिस्ट किया गया और टेंडर निरस्त किए गए। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि जिनके बयानों के आधार पर ACB कार्रवाई कर रही है, उनके खिलाफ पहले ही प्राथमिकी दर्ज कराई जा चुकी है।

प्रशासनिक हलकों में हलचल

इस घटनाक्रम के बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल बढ़ गई है। पंत वर्तमान में केंद्र सरकार में सचिव पद पर कार्यरत हैं और पूर्व में राज्य के शीर्ष प्रशासनिक पद पर रह चुके हैं। अब निगाहें हाईकोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि जांच की दिशा क्या होगी और क्या इसके दायरे का विस्तार किया जाएगा।