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ढाई महीने चली खींचतान के बाद धारावाहिक ‘कौन बनेगा अध्यक्ष’ का अंतिम एपिसोड

ढाई महीने चली खींचतान के बाद राजस्थान के राजनीतिक धारावाहिक "कौन बनेगा अध्यक्ष" का पटाक्षेप हो गया।
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Madan Lal Saini

अमित वाजपेयी
ढाई महीने चली खींचतान के बाद राजस्थान के राजनीतिक धारावाहिक "कौन बनेगा अध्यक्ष" का पटाक्षेप हो गया। इसके निर्माता-निर्देशक थे-भाजपा के केन्द्रीय और राज्य स्तर के नेता। चुनावों का मौसम पास आने के साथ राजनीतिक धारावाहिकों पर आने वाले दिनों में ऐसे कई एपिसोड दिखेंगे। अभी राजस्थान में भाजपा का एक प्रकरण पूरा हुआ। शीघ्र ही मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी शुरू हो सकता है। कहीं न कहीं रिहर्सल जरूर चल रहा होगा। भाजपा के बाद कांग्रेस में भी ऐसी ही तैयारियां चल रही होंगी। देखें, कब-क्या देखने को मिलता है।

राजस्थान में अध्यक्ष बदलने का जो प्रकरण शुरू हुआ, वह संघ के तृतीय वर्ष शिक्षित मदनलाल सैनी को प्रदेशाध्यक्ष पद पर विराजमान करने के साथ समाप्त हुआ। यह प्रकरण इतना लम्बा खिंच जाएगा, ऐसी आशंका किसी को नहीं थी। जिस तरह जल्दबाजी में यकायक सैनी के नाम की घोषणा हुई, वह भी बहुतों को आश्चर्य में डाल गई। पर राजनीति के पंडित अनुमान लगा चुके थे कि अब पर्दा गिरने का समय आ गया।

सबसे बड़ा कारण था कि नरेन्द्र मोदी 7 जुलाई को राजस्थान आ रहे हैं। वे आएंगे तो सभा-समारोह भी होंगे। ऐसे में उनके और मुख्यमंत्री के साथ प्रदेश अध्यक्ष को मंच पर नहीं बैठाना जनता में गलत संदेश पहुंचा सकता था। इस नाटक को भाजपा के शीर्ष और प्रदेश नेतृत्व के बीच सीधी और अप्रिय खींचतान के रूप में देखा-सुना और प्रचारित किया जा रहा था। पर नेतृत्व से ज्यादा भाजपा के कई अन्य नेता भी अपने-अपने लाभ के लिए पर्दे के पीछे खड़े होकर दांव लगा रहे थे। होड़ निर्विवाद रूप से प्रदेश की सत्ता में वर्चस्व स्थापित करने की थी।

अध्यक्ष पद के प्रमुख दावेदार के रूप में केन्द्रीय कृषि राज्यमंत्री और जोधपुर के लोकप्रिय सांसद गजेन्द्र सिंह शेखावत का नाम लगभग अंतिम रूप से घोषित कर दिया गया था। उनकी छवि निर्विवाद, सक्रिय और मिलनसार नेता की रही है। माना गया था कि ज्यादातर लोगों को उनके नाम पर कोई विरोध नहीं होगा। असल में उनके नाम को इतना आगे और पुरजोर तरीके से आगे बढ़ाने के पीछे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के अत्यन्त निकट माने जाने वाले एक ऐसे सांसद का दिमाग था, जिनकी स्वयं की नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थी।

मुख्यमंत्री खेमे को इस खेल को भांपते देर नहीं लगी और इसीलिए जिद के दर्जे तक केन्द्रीय नेतृत्व तक यह बात पहुंचाई गई कि भले ही किसी को भी अध्यक्ष बना दिया जाए, शेखावत का नाम मंजूर नहीं है। कई बार समझाइश हुई। कई बार प्रेमपूर्वक तो कई बार धमका कर। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और उनके निकट के कई मंत्रियों को दिल्ली चक्कर लगाने पड़े पर गतिरोध ऐसा बना कि ढाई महीने निकल गए। यहां तक कि अध्यक्ष पद को लेकर चुटकुलेबाजी शुरू हो गई। वार्ताओं के कई दौर चले। जीत-हार के समीकरण एक-दूसरे को समझाए गए। जातिगत गणित के हिसाब-किताब में भी कई बार मामला उलझा।

जातिगत हिसाब-किताब का एक दिलचस्प समीकरण इस मामले को हल की तरफ ले जाने में सबसे ज्यादा मददगाार साबित हुआ। इस समीकरण को हल तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका भी एक अन्य सांसद की रही। यह सांसद भी अमित शाह के नजदीक माने जाते हैं, पर राजस्थान से होने के बावजूद पार्टी ने इनके राजनीतिक कौशल का गुजरात में ज्यादा इस्तेमाल किया है।

समीकरण यह रहा कि पार्टी राजपूत, जाट या ब्राह्मण जैसी प्रभावशाली जातियों से अध्यक्ष बनाने जैसे प्रयोग कर भूसे के ढेर में चिंगारी फेंकने से बचे। अध्यक्ष पद पर लाया जाए किसी अन्य जाति से। अन्य पिछड़ा वर्ग से हो तो सोने में सुहागा। फिर यह भी बताया गया कि कांगे्रस के दो बड़े नेताओं में से एक अशोक गहलोत (माली) और दूसरे सचिन पायलट(गुर्जर) भी अन्य पिछड़े वर्ग की अपेक्षाकृत कम राजनीतिक प्रभाव वाली जातियों से हैं। इससे आने वाले चुनाव में कांग्रेस का यह कार्ड भी प्रभावहीन हो जाएगा। इस तरह मदनलाल सैनी (माली) का नाम सामने आया।

संघ को तो इससे ज्यादा प्रसन्नता की क्या बात लग सकती है कि उनके कार्यकर्ता को इस महत्वपूर्ण पद पर सुशोभित किया जाए। और थोड़े ना नुकुर के बाद सहमति बन ही गई। केन्द्र को देर-सवेर यह बात भी समझ में आई कि राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में क्षेत्रीय क्षत्रपों की उपेक्षा करना आत्मघाती होगा। असंतुष्ट नेता घनश्याम तिवाड़ी नई पार्टी लेकर ताल-ठोकने उतर गए तो विरोधी क्षेत्रीय गठजोड़ की आशंका ने इस निर्णय पर पहुंचने में और मदद कर दी। अब इंतजार है राजनीतिक प्राइम टाइम पर कुछ एक नए धारावाहिकों का। तैयारियां जोरों पर चल रही हैं, देखते हैं किस धारावाहिक को सबसे ज्यादा टीआरपी मिलती है।

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