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Ninder Protest: नींदड़ में जेडीए की परेशानी बने किसानों के पोते-पोतियां, तकनीकी रूप से गलत बता रहा जेडीए

जेडीए प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि किसानों की यह मांग तकनीकी रूप से सही नहीं है। इसलिए इसे नहीं माना जा सकता...

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जयपुर

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Dinesh Saini

Oct 26, 2017

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जयपुर। नींदड़ में सत्याग्रह कर रहे किसानों और जयपुर विकास प्राधिकरण के बीच सहमति में एक पेंच फंसा है। जेडीए के मुताबिक आंदोलन कर रहे किसानों की एक मांग ये है कि खातेदार किसानों के पुत्र, पुत्रियों, पोते और पोतियों के हिस्से कितनी जमीन आएगी और अवाप्ति से उनके आर्थिक हितों पर कितना असर पड़ेगा, इसका सर्वे किया जाए। जेडीए प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि किसानों की यह मांग तकनीकी रूप से सही नहीं है। इसलिए इसे नहीं माना जा सकता।

जेडीए प्रशासन का कहना है कि नींदड़ में किसानों की जमीन भूमि अवाप्ति अधिनियम 1894 के तहत अवाप्त की गई थी। इस अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसमें खातेदार किसान के पुत्र, पुत्रियों, पोते और पोतियों के आर्थिक हितों पर पडऩे वाले असर का आर्थिक सर्वे किया जाए। जेडीए प्रशासन ने किसानों की इस मांग को छोडक़र बाकी मांगे मानने का दावा किया है। साथ ही कहा है कि इसे लेकर किसानों के साथ सहमति भी बन गई है।

जेडीए का कहना है कि नींदड़ आवासीय योजना की अवाप्ति के विरोध में 23 खातेदारों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जो कोर्ट खारिज कर चुका है। इसलिए अवाप्ति का विरोध सही नहीं है। जेडीए प्रशासन ने किसानों पर जेडीए के स्वामित्व वाली जमीन पर काम करने से रोकने का आरोप भी लगाया है।

जेडीए के पास 482 बीघा
जानकारी के मुताबिक जेडीए क पास सरकारी और मंदिर माफी की 200 बीघा जमीन है, जबकि 282 बीघा जमीन किसानों ने जेडीए को सरेंडर की है। जेडीए शुरुआत में सरकारी भूमि और मंदिर माफी की 200 बीघा पर कब्जा करने की कार्रवाई करेगा। किसान मंदिर माफी की जमीन पर जेडीए के कब्जे का विरोध कर रहे हैं। जबकि जेडीए करीबन 482 बीघा जमीन पर कब्जा लेने की रणनीति बना रहा है।

ये है जमीन का गणित
गौरतलब है कि जेडीए की नींदड़ आवासीय योजना 1,350 बीघा जमीन में बनना प्रस्तावित है। इसमें से 200 बीघा सरकारी और मंदिर माफी की भूमि है। जबकि 282 बीघा किसानों ने समर्पित कर रखी है। बाकी बची करीब 850 बीघा जमीन किसानों ने अभी तक जेडीए को सरेंडर नहीं की है। जेडीए ने इस जमीन को अवाप्त मानते हुए इसका मुआवजा कोर्ट में जमा करवा दिया है। लेकिन किसानों ने कोर्ट से मुआवजा लिया नहीं है। जमीन सत्याग्रह के संयोजक नगेन्द्र शेखावत का कहना है कि किसानों ने जो 282 बीघा जमीन जेडीए को सरेंडर की है, उसमें से लगभग 150 बीघा सरेंडर करने वाले किसान सत्याग्रह में शामिल हैं। बाकी बची 132 बीघा जमीन पर 8 आवासीय कॉलोनियां और 20 ढाणियां बसी है। मंदिर माफी की जमीन पर जेडीए कब्जा ले नहीं सकता। ऐसे में जेडीए सिर्फ सरकारी भूमि पर ही कब्जा ले सकता है।