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PKC-ERCP Project: राजस्थान के 21 जिलों में 90 की बजाय अब 158 बांध-तालाब तक पहुंचेगा पानी

PKC-ERCP Project: जल संसाधन विभाग ने 21 जिलों के लिए नए सिरे से तैयार डीपीआर में छोटे-बड़े बांधों के अलावा तालाब व अन्य जल स्रोतों को भी जोड़ा है।

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जयपुर। पार्वती-कालीसिंध-चंबल ईस्टर्न राजस्थान कैनाल प्रोजेक्ट ( PKC-ERCP ) से 90 की जगह 158 बांध-तालाब और अन्य जल स्रोत तक पानी पहुंचेगा। जल संसाधन विभाग ने 21 जिलों के लिए नए सिरे से तैयार डीपीआर में छोटे-बड़े बांधों के अलावा तालाब व अन्य जल स्रोतों को भी जोड़ा है। स्थानीय लोगों के लिए ये छोटे जल स्रोत सिंचाई व पेजयल का अहम हिस्सा हैं।

केन्द्रीय जल आयोग को भेजी डीपीआर में जल स्रोतों का दायरा काफी बढ़ा दिया गया। इसके लिए 600 मिलीयन क्यूबिक मीटर पानी रिजर्व रखने की भी बात कही जा रही है। राज्य सरकार एक बार फिर इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की औपचारिक शुरुआत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से कराने के लिए प्रयास कर रही है। सूत्रों के मुताबिक इससे पहले केन्द्र सरकार इस प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दे सकती है। ऐसा होता है तो निर्माण लागत का 90 प्रतिशत पैसा केन्द्र सरकार वहन करेगी।

पहला चरण: बीसलपुर-ईसरदा तक आएगा पानी

पीकेसी-ईआरसीपी का पहला चरण चार साल में पूरा होगा। इसमें नवनेरा बैराज से बीसलपुर और ईसरदा तक पानी लाया जाएगा। रामगढ़ बैराज, महलपुर बैराज, नौनेरा में नहरी तंत्र और पपिंग स्टेशन, मेज नदी पर पपिंग स्टेशन बनाया जाएगा। साथ ही 2.6 किलोमीटर लंबी टनल भी तैयार की जाएगी, जो 12 मीटर चौड़ी होगी। इसकी लागत करीब 9600 करोड़ रुपए आंकी गई है। दूसरे चरण के लिए भी होमवर्क कर रहे हैं।

बांध से बांध जुड़ें तो यह फायदा

ओवरलो हो रहे बांधों का पानी व्यर्थ नहीं बहेगा और न ही इससे आस-पास के गांवों को खाली कराने की नौबत आएगी। अभी ज्यादातर बड़े बांध भरने के बाद गांव खाली कराए जाते हैं। ओवरलो होने से फसलें भी बर्बाद होती हैं।

खाली बांध में पानी पहुंचने से स्थानीय लोगों की पेयजल व सिंचाई की समस्या दूर हो सकेगी।

बांध से बांध को जोड़ने के लिए जिस रूट से नदी, नहर गुजरेगी, उस रूट पर कृषि का दायरा बढ़ेगा।

औद्योगिक गतिविधियां बढ़ने की स्थितियां बनेंगी, क्योंकि कई उद्योगों को पानी की ज्यादा जरूरत होती है। इससे इलाके का इकोनामिक डवलपमेंट भी होगा।

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राजनीति की भेंट नहीं चढ़ जाए

सरकार नई डीपीआर में शामिल किए बांध, तालाब व अन्य जल स्रोतों के नाम का खुलासा करने से बच रही है। तर्क दे रहे हैं कि, पहले डीपीआर केन्द्रीय जल आयोग से स्वीकृत होनी जरूरी है। इससे पहले खुलासा करते हैं तो ’राजनीति’ की भेंट चढ़ने की आशंका रहेगी।