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काम पूरा करने के दबाव में बढ़ी कारीगरों की रफ्तार

जयपुर

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Newsdesk

Aug 26, 2026

Rajasthan

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कोलकाता. दुर्गापूजा का समय जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे पंडाल निर्माण का काम भी तेज होता जा रहा है। महानगर समेत राज्य के विभिन्न इलाकों में बांस, कपड़े, लकड़ी, रस्सी और दूसरे सजावटी सामान के साथ कारीगरों की आवाजाही बढ़ गई है। इन पंडालों की भव्यता के पीछे बड़ी संख्या में ऐसे श्रमिक और कारीगर हैं, जो पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों से कुछ महीनों के लिए शहर का रुख करते हैं। खासकर पूर्व और पश्चिम मेदिनीपुर, नदिया तथा उत्तर और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों से आने वाले कारीगर इस काम में बड़ी भूमिका निभाते हैं। एक पंडाल को तैयार करने में बांस और लकड़ी का ढांचा खड़ा करने वाले मजदूरों के साथ बढ़ई, राजमिस्त्री, बिजली मिस्त्री, चित्रकार, सजावटकर्मी और विभिन्न तरह के हस्तशिल्प में दक्ष कारीगरों की जरूरत पड़ती है। कई टीमों में ग्रामीण क्षेत्रों से आए किसान और खेतिहर मजदूर भी काम करते हैं, जिन्हें पीढ़ियों से पंडाल निर्माण का हुनर हासिल है। इन कारीगरों के लिए दुर्गोत्सव साल की कमाई का महत्वपूर्ण मौका है। ग्रामीण कारीगरों के लिए दुर्गापूजा से होने वाली कमाई कई महीनों तक परिवार की जरूरत पूरी करने का सहारा बनती है। पूजा पंडाल का निर्माण कर रहे एक कारीगर बिपुल दास ने बताया कि ग्रामीण इलाकों में खेती, खेतिहर मजदूरी और छोटे-मोटे काम से होने वाली आमदनी पूरे साल परिवार चलाने के लिए पर्याप्त नहीं होती। ऐसे में पूजा के मौसम में मिलने वाला पंडाल निर्माण का काम हमारी आजीविका चलाने के लिए आवश्यक आय में महत्वपूर्ण योगदान करता है। उन्होंने कहा कि लिए दुर्गापूजा के आसपास के दो-तीन महीने आमदनी के लिहाज से साल के सबसे महत्वपूर्ण महीनों में शामिल होते हैं।













समय और बारिश बड़ी चुनौती



पंडाल निर्माताओं के लिए समय, सुरक्षा और बारिश की प्रमुख चुनौती होती है। बप्पन साव ने बताया कि पंडाल की योजना और डिजाइन पर काम कई महीने पहले शुरू हो सकता है, लेकिन मौके पर ढांचा खड़ा करने और सजावट का काम पूजा के पहले अंतिम एक-दो महीनों में बेहद तेज हो जाता है। कई जगह कारीगरों को लगातार कई पालियों में काम करना पड़ता है। तय तारीख तक पंडाल पूरा करने का दबाव इतना अधिक रहता है कि सामान्य कामकाजी समय की सीमा टूट जाती है। उन्होंने बताया कि बारिश भी पंडाल निर्माण से जुड़े कारीगरों के लिए बड़ी चुनौती बनती है। बप्पन साव ने बताया कि बांस और कपड़े से बने ढांचे को लंबे समय तक बारिश से बचाना जरूरी होता है। लगातार बारिश होने पर निर्माण कार्य प्रभावित होता है और सामग्री को सुरक्षित रखना कठिन हो जाता है। आयोजन का दिन पहले से तय होता है इसलिए काम में थोड़ी भी देरी होने पर उसका दबाव बाद के दिनों में मजदूरों पर बढ़ जाता है। यही वजह है कि मौसम खराब होने के बाद कारीगरों को अतिरिक्त समय तक काम करना पड़ता है। कारीगरों के मुताबिक, काम की इस रफ्तार के साथ सुरक्षा का सवाल भी जुड़ा है। कई आयोजक उत्सव में भव्यता के लिए ऊंचे पंडाल का निर्माण करवाते है। ऐसे पंडालों पर बांस बांधने और सजावट का काम जमीन से काफी ऊपर किया जाता है।











मुख्य रूप से मौसमी रोजगार



पंडाल निर्माण से जुड़े श्रमिकों की बड़ी समस्या यह है कि उनका रोजगार मुख्य रूप से मौसमी है। दुर्गापूजा के बाद कुछ कारीगर कालीपूजा, जगद्धात्री पूजा और अन्य आयोजनों के लिए काम तलाशते हैं। कुछ को शादी-ब्याह, मेलों और दूसरे कार्यक्रमों के लिए सजावट का काम मिल जाता है। फिर भी साल के बाकी हिस्से में काम की निरंतरता सुनिश्चित नहीं रहती। कई कारीगरों को वापस गांव जाकर खेती या दूसरे अस्थायी रोजगार पर निर्भर होना पड़ता है। यही मौसमी रोजगार ग्रामीण कारीगरों के लिए अवसर भी है और चुनौती भी। पूजा के मौसम में मिलने वाली कमाई से परिवार के जरूरी खर्च, बच्चों की पढ़ाई, कपड़े और त्योहार से जुड़े खर्च पूरे करने में मदद मिलती है। लेकिन काम खत्म होने के बाद आमदनी में अचानक कमी आ जाती है। कुछ कारीगरों ने पंडाल निर्माण के अलावा जूट शिल्प और अन्य हस्तशिल्प जैसे कामों को आय के अतिरिक्त स्रोत के तौर पर अपनाया है।