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राजस्थान चुनाव 2023: हाथी का पूर्वी राजस्थान पर फोकस, कुछ सीटों पर वोट काटने की स्थिति में झाड़ू

प्रदेश की सत्ता पर कब्जे के लिए राजनीतिक बिसात पर चल रहा शह- मात का खेल अंतिम दौर में बेहद रोचक हो चला है। कांग्रेस और भाजपा के बीच जहां "रिवाज" और "राज" बदलने का संघर्ष है, वही प्रदेश में तीसरे दल के नाम पर मौजूद छोटे दल कुछ सीटों पर मुकाबला रोचक बना रहे हैं।

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जयपुर

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Nupur Sharma

Nov 20, 2023

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ओमप्रकाश शर्मा
Rajasthan Assembly Election 2023 : प्रदेश की सत्ता पर कब्जे के लिए राजनीतिक बिसात पर चल रहा शह- मात का खेल अंतिम दौर में बेहद रोचक हो चला है। कांग्रेस और भाजपा के बीच जहां "रिवाज" और "राज" बदलने का संघर्ष है, वही प्रदेश में तीसरे दल के नाम पर मौजूद छोटे दल कुछ सीटों पर मुकाबला रोचक बना रहे हैं। यूं तो पिछले तीन दशकों में तीसरा दल कभी प्रभावी भूमिका में नहीं रहा, लेकिन हर चुनाव में ये दल न सिर्फ कुछ सीटों पर जीत का पताका फहराता है, बल्कि कुछ सीटों पर बड़े दलों की किलेबंदी को ध्वस्त भी करता आया है। इस बार भी कुछ सीटों पर ऐसा ही दिलचस्प नजारा देखने को मिल रहा है। बसपा ने जहां अपना पूरा फोकस पूर्वी राजस्थान पर कर रखा है, जहां से उसे उम्मीदें हैं, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली और पंजाब की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी की झाड़ू अभी चुनाव मैदान में सक्रिय नहीं दिखाई दे रही। 'आप' के स्टार प्रचारक अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान का भी मतदान से सात दिन पहले तक यहां नहीं आना चर्चाओं का विषय बना हुआ है। वहीं आदिवासी क्षेत्र में इस बार बीटीपी के साथ भारतीय आदिवासी पार्टी (बाप) भी असरदार दिख रही है।

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कुछ सीटों पर वोट काटने की स्थिति में दिख रही 'आप' को बड़ा झटका गुरुवार को लगा जब हवामहल सीट से उनके उम्मीदवार पप्पू कुरैशी ने कांग्रेस को समर्थन दे दिया। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उनके घर पहुंच कर मना लिया। 'आप' इसी तरह राजधानी की कुछ और सीटों पर वोट काटने की स्थिति में हैं। ऐसे में पार्टी आशंकित है कि और किसी और सीट पर भी हवामहल जैसी स्थिति न हो जाए। पार्टी के स्टार प्रचारकों के कार्यक्रम में देरी को भी इसी से जोड़ कर देखा जा रहा है।

स्टार प्रचारक मायावती, चार दिन में आठ सभाएं
बसपा के स्टार प्रचारकों में एक मात्र मायावती ही मुख्य चेहरा है। शुक्रवार को धौलपुर से जनसभाएं शुरू हुई। धौलपुर, नदबई, बानसूर, बांदीकुई, करौली और गंगापुर के बाद अब सोमवार को खेतड़ी व लाड़नूं में मायावती जनसभा को संबोधित करेंगी। बसपा ने वर्ष 2018 के चुनाव में नगर, नदबई, तिजारा, किशनगढ़ बास, करौली व उदयपुरवाटी पर जीत दर्ज की थी। इसलिए इस बार भी इस क्षेत्र में पार्टी अधिक सक्रिय है। पार्टी ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि चुनाव जीतने के बाद बागी होने वाले विधायकों को टिकट नहीं दिया जाएगा। इस कारण सबसे पहले उन्हीं सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित किए थे। इनमें से एक तिजारा से पार्टी के उम्मीदवार इमरान खान को कांग्रेस इस बार चुनाव से पहले ही अपने खेमे में ले गई और उसे उम्मीदवार बना दिया।

धौलपुर: भाजपा-कांग्रेस के उम्मीदवारों में अदला-बदली
इस सीट से कांग्रेस उम्मीदवार शोभारानी कुशवाह गत चुनावों में भाजपा के टिकट पर जीती थीं। इसी तरह भाजपा उम्मीदवार शिवचरण कुशवाह गत चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार थे। दोनों प्रत्याशी रिश्तेदार भी हैं। भाजपा-कांग्रेस के मुकाबले को बसपा से रितेश शर्मा की उपस्थिति ने दिलचस्प बना दिया है। शोभारानी से पहले उनके पति यहां से वर्ष 2013 में बसपा के टिकट पर विधायक चुने गए थे। बसपा ने अपने वोटों को साधने के लिए पहली बड़ी जनसभा यहीं की है।

बाड़ी: भाजपा से बागी बसपा से, कांग्रेस से बागी भाजपा से
नामांकन के अंतिम दिनों में बाड़ी की चुनावी तस्वीर साफ हुई है। छह नवंबर के अंतिम समय से पहले पांच नवंबर को कांग्रेस विधायक गिर्राज मलिंगा भाजपा में शामिल हुए और उसी दिन उन्हें पार्टी ने उम्मीदवार बना दिया। इससे पहले भाजपा नेता जसवंत सिंह गुर्जर पहले ही पार्टी छोड़ बसपा के टिकट पर चुनावी मैदान में हैं। ऐसे में अब भाजपा के मलिंगा और कांग्रेस के प्रशांत सिंह के बीच जसवंत सिंह ने चुनावी मुकाबले को रोचक कर दिया है। यहां एएईएन पर हुए हमले के आरोपी मलिंगा कांग्रेस विधायक थे। वे अब भाजपा से हैं। इस स्थिति को भांपते हुए ही शनिवार को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत घायल एईएन हर्षाधिपति से मिलने सवाई मानसिंह अस्पताल पहुंचे। हमले की घटना से एससी वर्ग नाराज है। ऐसे में बसपा की नजर एससी वर्ग के वोटों पर हैं।

पिता टोडाभीम से भाजपा प्रत्याशी, पुत्र करौली से बसपा प्रत्याशी
करौली में मुख्य टक्कर भाजपा के दर्शन सिंह और कांग्रेस के लाखन सिंह में हैं। इसमें सेंध लगाने के लिए बसपा से रवीन्द्र मीना उतरे हैं। रोचक तथ्य यह है कि रवीन्द्र के पिता रामनिवास मीना नजदीकी सीट टोड़ाभीम से भाजपा प्रत्याशी हैं। ईआरसीपी पर मुखर रहने वाले रामनिवास ऐनवक्त पर भाजपा में शामिल हुए और टिकट भी हासिल कर लिया। उन्हें टक्कर दे रहे हैं कांग्रेस के घनश्याम मेहर। वे यहां कांग्रेस के टिकट पर वर्ष 2013 का चुनाव जीत चुके हैं। यहां कांग्रेस से बागी होकर कल्पना मीना बसपा से मैदान में हैं। कल्पना यहां कांग्रेस से प्रधान भी हैं।

नदबई: तीनों उम्मीदवार का बसपा से रहा नाता
यहां टक्कर कांग्रेस के जोगेन्द्र सिंह अवाना और भाजपा के जगतसिंह के बीच है। कांग्रेस उम्मीदवार जोगेन्द्र सिंह अवाना गत चुनाव बसपा के टिकट पर जीते थे। बसपा ने इस बार खेमकरण को अपना प्रत्याशी बनाया है। भाजपा उम्मीदवार जगतसिंह गत चुनाव में अलवर की रामगढ़ सीट से बसपा के उम्मीदवार थे। इस चुनाव में जीत कांग्रेस की साफिया जुबैर की हुई थी। वर्ष 2018 में चुनाव के दौरान एक प्रत्याशी की मौत पर चुनाव बाद में हुए थे।

खेतड़ी: चाचा-भतीजी के बीच बसपा उम्मीदवार
भाजपा प्रत्याशी धर्मपाल का यह तीसरा चुनाव है। वहीं कांग्रेस के टिकट पर मनीषा हैं जो धर्मपाल की भतीजी है। मनीषा लगातार दूसरी बार प्रधान भी है। धर्मपाल गत चुनाव में दूसरे नंबर रहे थे। दोनों परिवार पहले एक ही पार्टी में सक्रिय थे। अब अलग-अलग पार्टी में हैं। चाचा-भतीजी के साथ ही मैदान में असरदार उपस्थिति बसपा के मनोज घुमरिया की भी है। बसपा ने उन्हें पहले दौर में ही टिकट देकर मैदान में उतार दिया था।

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चौहटन: कागा की उपस्थिति से बदल रहे समीकरण
यहां गत चुनाव की तरह भाजपा-कांग्रेस ने अपने प्रत्याशी यथावत रखे हैं। वर्तमान विधायक पदमाराम कांग्रेस से तथा भाजपा से आदुराम मेघवाल। तीसरे प्रमुख उम्मीदवार के रूप में पूर्व विधायक तरुण राय कागा आरएलपी से मैदान में हैं। वे वर्ष 2013 के चुनाव में भाजपा के टिकट पर चुनाव जीते थे। यहां इन तीन के अलावा बसपा से भरतराम और एक निर्दलीय श्रवण कुमार मैदान में हैं। उम्मीदवार कम होने से मुकाबला और रोचक होता दिख रहा है।

मेड़ता: आरएलपी और भाजपा में टक्कर
वर्तमान विधायक आरएलपी की इंद्रादेवी को टक्कर देने के लिए भाजपा ने गत चुनाव में निर्दलीय रहे लक्ष्मण राम को मैदान में उतारा है। वे दूसरे नंबर पर रहे थे। इसी को देखते हुए आरएलपी और भाजपा में टक्कर मानी जा रही है। कांग्रेस से यहां शिवरतन मैदान में हैं।

बायतु: समीकरण पांच साल पुराने
बायतु में इस चुनाव में भी समीकरण समान हैं। गत चुनाव के विजेता कांग्रेस के हरीश चौधरी दूसरे नंबर रहे आरएलपी के उम्मेदाराम इस बार भी मैदान में हैं। भाजपा से इस बार कैलाश चौधरी के बजाय बालाराम मूंड को उतारा है। यहां आरएलपी भाजपा-कांग्रेस दोनों के लिए नुकसान पहुंचाने की स्थिति में है।

भारतीय आदिवासी पार्टी
आसपुर: उमेश की उपस्थिति से भाजपा-कांग्रेस परेशान
गत चुनाव में दूसरे नंबर रहे उमेश मीना इस बार भारतीय आदिवासी पार्टी से मैदान में हैं। दूसरे नंबर रहते उन्हें 51 हजार से अधिक मत मिल थे। क्षेत्र में पकड़ को देखते हुए उनकी स्थिति मजबूत मानी जा रही है। भाजपा ने वर्तमान विधायक गोपीचंद पर ही भरोसा जताया है, वहीं कांग्रेस से राकेश रोत मैदान में हैं।

चौरासी: कांग्रेस के बागी से आदिवासी पार्टी मान रही राह आसान
बीटीपी के टिकट से विधायक राजकुमार रोत इस बार 'बाप' से मैदान में हैं। वहीं भाजपा से इस बार भी सुशील कटारा मैदान में हैं। कांग्रेस से ताराचंद है, लेकिन टिकट नहीं मिलने से इसी पार्टी के महेन्द्र निर्दलीय मैदान में उतरे हैं। इससे वोटों में बिखराव की आशंका है। बावजूद इसके रोत की स्थिति ठीक मानी जा रही है।