जब बिजली कंपनियां उपभोक्ताओं को बिजली बेचती है तो उसका खर्च (जैसे बिजली उत्पादन, खरीद, ट्रांसमिशन और रखरखाव) तय दरों से ज़्यादा होता है, लेकिन कई बार सरकार या विनियामक आयोग समय पर बिजली के दाम (टैरिफ) नहीं बढ़ाते। ऐसी स्थिति में कंपनियां उपभोक्ताओं से पूरी लागत नहीं वसूल पाती। इस बची हुई रकम को ही रेगुलेटरी एसेट मानते हैं। इसे बाद में टैरिफ बढ़ाकर वसूला जाता है। जब तक वसूली नहीं होती, कंपनियां कर्ज लेकर खर्च चलाती हैं। अफसरों का दावा है कि बिजली खर्च बढ़ने के बावजूद दरों में समय पर वृद्धि न होने से रेगुलेटरी एसेट्स 47 हजार करोड़ रुपए से अधिक हो गए।