
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट। Photo: AI-generated
जयपुर। राजस्थान में खाद्य सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी हकीकत ने ‘सिस्टम’ की पोल खोलकर रख दी है। वर्ष 2022 से जनवरी 2026 तक राज्य में दूध समेत विभिन्न खाद्य पदार्थों के 69,287 नमूनों की जांच हुई, जिनमें से 15,644 नमूने (22.6 प्रतिशत) अमानक पाए गए। यानी हर पांच में से एक से ज्यादा नमूना गुणवत्ता की कसौटी पर फेल रहा। इसके बावजूद लाइसेंस निलंबन की दर 0.02 प्रतिशत से भी कम रही। चार साल में केवल एक मामले में एफआइआर दर्ज हुई और महज तीन प्रतिष्ठानों के लाइसेंस निलंबित किए गए। इनमें से एक का लाइसेंस भी बहाल हो चुका है।
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की ओर से एक सवाल के जवाब में राजस्थान विधानसभा को भेजी गई रिपोर्ट में यह परेशान करने वाले हालात सामने आए हैं। हालांकि विभाग का दावा है कि इनमें बड़ी संख्या में मामले सब स्टैंडर्ड और मिसब्रांड श्रेणी के हैं, जिनमें पेनल्टी लगाने और न्यायालय में परिवाद पेश करने का प्रावधान है। 13,679 मामलों में न्यायालयों में परिवाद पेश किए गए, 9 मामलों में सजा हुई और 21.37 करोड़ रुपए का जुर्माना वसूला गया।
1. बीकानेर- मैसर्स प्रेम मिष्ठान भंडार का लाइसेंस निलंबित किया गया, बाद में नियमों की पालना पूरी करने पर बहाल।
2. अजमेर- मैसर्स शिवांश पिज्जा चीज, वर्तमान में प्रतिष्ठान बंद।
3. जयपुर- मैसर्स रिद्धी सिद्धी इंडस्ट्रीज, वर्तमान में प्रतिष्ठान बंद।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि दूध के 6,496 नमूनों की जांच की गई। इनमें हनुमानगढ़ जिले के एक नमूने में सॉर्बिटोल की मौजूदगी पाई गई। सॉर्बिटोल एक कृत्रिम मिठास देने वाला रसायन है। रिपोर्ट में दूध में यूरिया या अन्य प्रतिबंधित एवं हानिकारक रसायनों के व्यापक उपयोग का कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है।
| जिला | अमानक नमूने |
|---|---|
| अलवर | 1,028 |
| जयपुर प्रथम | 983 |
| कोटा | 722 |
| जयपुर द्वितीय | 700 |
| हनुमानगढ़ | 682 |
| जोधपुर | 620 |
| सीकर | 577 |
| टोंक | 540 |
| झुंझुनूं | 519 |
| भरतपुर | 472 |
| जिला | जुर्माना (रुपए) |
|---|---|
| दौसा | 1.48 करोड़ |
| बीकानेर | 1.31 करोड़ |
| टोंक | 1.15 करोड़ |
| अजमेर | 1.14 करोड़ |
| बाड़मेर | 1.10 करोड़ |
| अलवर | 1.09 करोड़ |
| उदयपुर | 98.45 लाख |
| नागौर | 96.75 लाख |
| झुंझुनूं | 96.61 लाख |
-15,644 अमानक नमूने मिलने के बावजूद लाइसेंस निलंबन की कार्रवाई सिर्फ तीन मामलों तक ही सीमित क्यों रही?
-क्या जुर्माना वसूलने के बाद मिलावटखोरों को कारोबार जारी रखने की छूट मिल जाती है?
-13,679 परिवादों के मुकाबले केवल 9 मामलों में सजा, क्या प्रभावी पैरवी की कमी रही?
-चार साल में केवल एक एफआइआर, क्या खाद्य सुरक्षा कानूनों का डर खत्म हो गया है?
-अमानक खाद्य पदार्थ बेचने वाले प्रतिष्ठानों की सूची सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
Updated on:
07 Jun 2026 09:25 am
Published on:
07 Jun 2026 09:25 am
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