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राजस्थान का रण: पहले मजबूत विपक्ष के लिए वोट मांगते थे दल

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जयपुर

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Abdul Bari

Nov 11, 2018

rajasthan ka ran

राजस्थान का रण: पहले मजबूत विपक्ष के लिए वोट मांगते थे दल

राजेंद्र बोड़ा/जयपुर.

राजस्थान के मतदाता 15 वीं विधानसभा के गठन के लिए 7 दिसंबर को अपना फैसला ईवीएम में दर्ज करेंगे। मतदाता का मन कि वे किसे चुनेंगे अब यह जानना कभी आसान नहीं हुआ। सभी राजनीतिक दल और उम्मीदवार उन्हें अपनी ओर झुकाने के लिए आकर्षक वादों के साथ प्रचार में जुटते हैं। इस बार भी कहानी वही है परन्तु नई सदी में जो नयी बात उभरी है वह है कि चुनावी रण में दुदुम्भी बजा रहे सभी राजनीतिक दल राज में आने के तलबगार हैं। वह ज़माना गया जब कईं पार्टियां सशक्त विपक्ष देने के लिए जनता से वोट मांगती थीं। यह ऐसा बदलाव है जो सामने होते हुए भी अव्यक्त है।
आपातकाल से पूर्व राज्य में कांग्रेस का ही बोलबाला रहा और एक दो अपवादों को छोड़ कर गैर कांग्रेस दल मिल कर भी चुनावी दंगल के बाद राज में नहीं पहुंच सके तब वे चुनावों में सशक्त विपक्ष के लिए ही वोट मांगते थे। 1977 के चुनावों में विपक्षी दल जनता पार्टी के झंडे तले कांग्रेस को शिकस्त देकर पहली बार राज में आये और फिर बिखर गए तब भी सरकार की निरंकुशता पर अंकुश लगाये रखने के लिए कुछ दल विधानसभा चुनावों में अपने उम्मीदवार खड़े करते रहे थे। मगर अब चुनावों में किसी भी राजनीतिक दल या उम्मीदवार द्वारा विपक्ष में बैठने के लिए वोट नहीं मांगे जाते। 1990 के दशक और उसके बाद बदली राजनीतिक परिस्थितियों के चलते सभी को गैर कांग्रेस गठबंधन बना कर जीत की किरण दिखने लगी तब से सशक्त विपक्ष के लिए वोट मांगे जाने की परंपरा विलुप्त हो गयी जिसे अब कोई याद भी नहीं करता।

विधानसभा में सशक्त विपक्ष बनाने का दौर ख़त्म होने के बाद भी अनेक राजनेता ऐसे भी रहे जो अपनी जुझारू छवि के कारण जो उम्र भर विपक्षी नेता की छवि बनाये रख सके भले ही उन्हों ने सत्ता में भी समय बिताया। इनमें सबसे प्रमुख नाम गंगानगर के प्रो. केदार का है जो राज्य में पहली गैर कांग्रेस सरकार में गृह मंत्री रहने के बाद भी अपनी विपक्षी नेता की छवि बनाये रख सके। कोटा के दाऊ दयाल जोशी, हनुमानगढ़ से वामपंथी श्योपत सिंह, भरतपुर से समाजवादी नेता पंडित राम किशन और जयपुर से गिरधारी लाल भार्गव अपना ऐसा वजूद बनाये रख सके।

सशक्त विपक्ष का चुनावी नारा शायद इसलिए भी धुंधला गया क्योंकि दो प्रमुख पार्टियों - कांग्रेस और बीजेपी - की आर्थिक वैचारिक प्रतिबद्धताओं के बीच की की दीवार 1990 के दशक में देश में नयी आर्थिक नीतियों के अपनाये जाने के बाद ढह गयी। अब राज्य के बेहतर आर्थिक प्रबंधन के लिए पार्टियां चुनावों में अपने को प्रस्तुत करती हैं जो पिछले दौर के चुनावों में अमूमन नहीं होता था।

विधान सभा के मौजूदा चुनाव में कांग्रेस और बीजीपी की मुख्य प्रतिस्पर्धा के बीच अन्य दल जो मोर्चे बना रहे हैं उनमें भी सशक्त विपक्ष की बजाय राज में आने का नारा ही सर्वोपरि है। इक्कीसवीं सदी के लोकतांत्रिक चुनावों में विधान सभा में सशक्त विपक्ष बनाने की दिलचस्पी किसी को नहीं है भले ही चुनाव परिणाम किन्हीं दलों को ना पक्ष में बैठने को मजबूर कर दे।

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