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राजस्थान की वीर और ऐतिहासिक धरा का राजनैतिक इतिहास मूल्यों, सिद्धांतों और उच्च नैतिक आदर्शों का गवाह रहा है। लोकतांत्रिक सफर में कई ऐसे साहसी और ऊंचे कद के नेता हुए हैं, जिन्होंने कुर्सी के रसूख को हमेशा अपनी अंतरात्मा की आवाज और नैतिक मूल्यों के नीचे रखा। जब-जब प्रदेश में कोई बड़ी प्रशासनिक चूक हुई, चुनावों में जनता का जनादेश उम्मीदों के विपरीत आया, या फिर नेताओं द्वारा जनता के सामने कोई बड़ा नीतिगत वादा किया गया, तो इन दिग्गज नेताओं ने बिना किसी संकोच के अपने पदों से तत्काल प्रभाव से इस्तीफे सौंप दिए।
आइए विस्तार से जानते हैं राजस्थान के राजनैतिक इतिहास के उन 5 सबसे बड़े और चर्चित वाकयों के बारे में, जिन्होंने मरुधरा की सियासत में 'नैतिकता के राजपथ' को हमेशा के लिए अमर कर दिया।
यह किस्सा भारत के प्रथम आम चुनाव यानी वर्ष 1952 का है, जब देश में लोकतंत्र अपनी शुरुआती सांसें ले रहा था। उस समय स्वतंत्रता सेनानी और कद्दावर नेता जयनारायण व्यास राजस्थान के मनोनीत मुख्यमंत्री थे और उनके नेतृत्व में ही पूरी कांग्रेस पार्टी मरुधरा के चुनावी मैदान में उतरी थी। व्यास जी ने उस समय दो विधानसभा सीटों- जोधपुर शहर (B सीट) और जालौर-ए (Jalore A) से अपना नामांकन दाखिल किया था।
जब चुनाव के परिणाम सामने आए, तो एक बहुत बड़ा सियासी उलटफेर हो चुका था। मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास इन दोनों ही सीटों से चुनाव हार गए थे। जोधपुर में उन्हें निर्दलीय उम्मीदवार महाराज उम्मेद सिंह के हाथों करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था।
चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस पार्टी के भीतर उनके समर्थकों और विधायकों के एक बहुत बड़े गुट ने जिद पकड़ ली कि व्यास जी को ही किसी भी तरह पर्दे के पीछे से सरकार का मुखिया बनाए रखा जाए या उन्हें विधान परिषद/उपचुनाव के जरिए तुरंत पद पर बनाए रखा जाए।
लेकिन राजनीतिक शुचिता, ईमानदारी और शुरुआती लोकतंत्र के उच्च आदर्शों का पालन करते हुए व्यास जी ने इस प्रस्ताव को पूरी तरह ठुकरा दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जिसे जनता ने प्रत्यक्ष रूप से नकार दिया हो, उसे सत्ता के शीर्ष पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
उन्होंने मुख्यमंत्री पद का अपना दावा पूरी तरह छोड़ दिया और टीकाराम पालीवाल को राजस्थान का पहला निर्वाचित मुख्यमंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त किया। हालांकि बाद में व्यास जी ने किशनगढ़ सीट पर हुए उपचुनाव को जीतकर पुनः लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता संभाली थी।
राजस्थान की राजनीति में वर्ष 1985 का दौर बेहद उथल-पुथल भरा था। उस समय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शिवचरण माथुर राजस्थान के मुख्यमंत्री पद की कमान संभाल रहे थे। फरवरी 1985 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भरतपुर जिले के डीग विधानसभा क्षेत्र में एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और रोंगटे खड़े कर देने वाला घटनाक्रम सामने आया। डीग से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे भरतपुर रियासत के राजपरिवार के कद्दावर सदस्य राजा मानसिंह की एक कथित पुलिस मुठभेड़ और गोलीबारी के दौरान मृत्यु हो गई।
इस घटना की खबर फैलते ही न केवल भरतपुर संभाग बल्कि पूरे राजस्थान और देश की राजनीति में एक बहुत बड़ा उबाल आ गया। आम जनता सड़कों पर उतर आई और तत्कालीन सरकार की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे। हालांकि मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर का इस पुलिस एक्शन से कोई सीधा संबंध नहीं था, लेकिन सूबे के मुखिया होने के नाते उन्होंने इस पूरी प्रशासनिक विफलता और राजा मानसिंह की मृत्यु से उपजे जनाक्रोश की पूरी नैतिक जिम्मेदारी अपने सिर पर ली।
लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हुए मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर ने चुनाव के ऐन बीच में ही 22 फरवरी 1985 को मुख्यमंत्री पद से अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंपकर सबको चौंका दिया था।
सितंबर 1987 में राजस्थान के सीकर जिले के देवराला (दीरावली) गांव में एक ऐसी दिल दहला देने वाली अमानवीय घटना घटित हुई, जिसने न केवल राजस्थान बल्कि पूरे भारत की सामाजिक और राजनैतिक चेतना को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया था। देवराला गांव में रूप कंवर नाम की एक नवविवाहित महिला का सती कांड हुआ, जिसके बाद देश-दुनिया में रूढ़िवादिता और तत्कालीन प्रशासनिक शिथिलता को लेकर राजस्थान की हरिदेव जोशी सरकार की चौतरफा और भारी किरकिरी होने लगी।
इस कुप्रथा और कानून-व्यवस्था की विफलता को लेकर केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार भी राज्य के नेतृत्व से बेहद खफा थी। हालांकि इस इस्तीफे के पीछे केवल सती कांड का सामाजिक दबाव ही एकमात्र कारण नहीं था, बल्कि कांग्रेस संगठन के भीतर अर्जुन सिंह और दिल्ली के केंद्रीय नेतृत्व के साथ चल रही अंदरूनी राजनैतिक खींचतान भी एक बड़ी वजह मानी जाती थी। लेकिन मुख्य रूप से देवराला सती कांड की नैतिक जिम्मेदारी और विपक्ष के तीखे हमलों के चलते आखिरकार जनवरी 1988 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था।
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के कद्दावर नेता मदनलाल खुराना को केंद्र की तत्कालीन सरकार की सिफारिश पर जनवरी 2004 में राजस्थान का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। राज्यपाल का पद पूर्णतया संवैधानिक, सुख-सुविधाओं से युक्त और दलगत राजनीति से पूरी तरह ऊपर होता है। लेकिन मदनलाल खुराना जैसे जमीनी और जन आंदोलन से निकले नेता के लिए राजभवन की चारदीवारी के भीतर शांत बैठना उनकी राजनैतिक प्रकृति के अनुकूल नहीं था।
अक्टूबर 2004 आते-आते उन्होंने एक बेहद ही चौंकाने वाला और स्वैच्छिक फैसला लिया। खुराना ने कहा कि वे लंबे समय तक इस संवैधानिक पद की सीमाओं में बंधकर नहीं रह सकते, क्योंकि देश में राजनैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना और दिल्ली के विकास के लिए धरातल पर काम करना उनकी आत्मा की आवाज है।
उन्होंने पूरी तरह स्वेच्छा और अपनी नैतिक प्राथमिकताओं के आधार पर अक्टूबर 2004 में राजस्थान के राज्यपाल के सर्वोच्च पद से अपना त्यागपत्र दे दिया और वापस दिल्ली की सक्रिय दलीय राजनीति के मैदान में लौट आए। यह इस्तीफा किसी विवाद या विफलता का परिणाम नहीं, बल्कि सिद्धांतों के लिए पद छोड़ने का अनूठा उदाहरण था।
राजस्थान की आधुनिक राजनीति के सबसे मुखर और फायरब्रांड नेता डॉ. किरोड़ी लाल मीणा का नाम भी इस सूची में शुमार है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने कैबिनेट मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा को पूर्वी राजस्थान की कुल 7 महत्वपूर्ण सीटों पर पार्टी को जिताने की एक बहुत बड़ी कमान और जिम्मेदारी सौंपी थी।
चुनाव प्रचार के दौरान बाबा किरोड़ी लाल मीणा ने पूरी दृढ़ता के साथ सार्वजनिक मंचों से यह खुला ऐलान कर दिया था कि यदि उनके प्रभाव वाले क्षेत्रों की सीटें, विशेषकर उनकी कर्मभूमि 'दौसा' या 'टोंक-सवाई माधोपुर' में से कोई भी सीट भाजपा हार जाती है, तो वे इसकी पूरी जिम्मेदारी लेते हुए अपने मंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे। जब लोकसभा चुनाव के नतीजे घोषित हुए, तो पूर्वी राजस्थान के समीकरण पूरी तरह बदल गए और भाजपा दौसा सहित कुछ प्रमुख सीटें चुनाव हार गई।
परिणाम आते ही डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ने अपनी उस पुरानी राजनैतिक घोषणा और "रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाई पर वचन ना जाई" के सिद्धांत पर अडिग रहते हुए जुलाई 2024 में कृषि और ग्रामीण विकास मंत्री जैसे महत्वपूर्ण कैबिनेट पद से अपना लिखित त्यागपत्र मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को सौंप दिया।
हालांकि बाद में भाजपा के शीर्ष केंद्रीय नेतृत्व, मुख्यमंत्री और संगठन के बड़े नेताओं के भारी हस्तक्षेप, मान-मनौव्वल और समझाइश के बाद जनहित में उन्होंने अपना कामकाज पुनः संभाल लिया था, लेकिन ऐन वक्त पर पद का मोह छोड़कर इस्तीफा दे देना उनके अदम्य साहस और नैतिक वचनबद्धता का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है।
Published on:
10 Jun 2026 03:05 pm
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