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Rajasthan Politics: विधायकों के प्रश्न पूछने पर कई तरह की पाबंदियां, मंत्रियों को छूट! छिड़ी नई बहस

Rajasthan Politics: विधानसभा सचिवालय की ओर से जारी 2 सर्कुलरों ने सदन में उठाए जाने वाले मुद्दों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सर्कुलरों में विधायकों के लिए प्रश्न पूछने को लेकर पाबंदियां लगाई गई हैं, जबकि मंत्रियों को जवाब देने के मामले में लचीला रुख अपनाया गया है।

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Rajasthan assembly

फाइल फोटो- राजस्थान विधानसभा

Rajasthan Assembly Budget Session: राजस्थान विधानसभा का बजट सत्र 28 जनवरी से शुरू होने जा रहा है। सत्र से पहले जहां विधायक प्रश्नकाल, शून्यकाल, ध्यानाकर्षण, स्थगन और पर्ची के माध्यम से जनहित के मुद्दे उठाने की तैयारी में जुटे हैं, वहीं विधानसभा सचिवालय की ओर से जारी दो सर्कुलरों ने सदन में उठाए जाने वाले मुद्दों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

इन सर्कुलरों में विधायकों के लिए प्रश्न पूछने को लेकर कई तरह की पाबंदियां लगाई गई हैं, जबकि मंत्रियों को जवाब देने के मामले में खासा लचीला रुख अपनाया गया है। इसे लेकर सत्ता और विपक्ष, दोनों ही पक्षों के विधायकों में असमंजस और असंतोष की स्थिति बनती दिख रही है।

प्रश्नकाल और शून्यकाल को लेकर विधानसभा सचिवालय ने हाल ही में तीन अलग-अलग सर्कुलर जारी किए हैं। तीनों सर्कुलर विधायकों को संबोधित हैं और इनमें प्रश्न पूछने की प्रक्रिया से लेकर विषयवस्तु तक को सीमित किया गया है।

प्रश्न पूछने संबंधी सर्कुलर में साफ तौर पर निर्देश दिए गए हैं कि विधायक पांच वर्ष से अधिक पुराने मामलों पर प्रश्न नहीं पूछेंगे। इसके अलावा सवाल राज्य या जिला स्तर के नहीं होंगे, बल्कि उन्हें किसी विशेष स्थान, विधानसभा क्षेत्र या तहसील स्तर तक ही सीमित रखा जाएगा। एक प्रश्न में तीन-चार बिंदुओं से अधिक शामिल नहीं किए जा सकेंगे।

योजनाएं ऑनलाइन तो प्रश्न नहीं लगाएं

सर्कुलर में यह भी कहा गया है कि अधिकांश विभागों की योजनाएं, नियम और अन्य जानकारियां ऑनलाइन उपलब्ध हैं, इसलिए इस तरह की सूचनाएं प्रश्नों के माध्यम से नहीं मांगी जाएं। विधानसभा सचिवालय ने विधायकों को यह निर्देश भी दिए हैं कि केवल सार्वजनिक हित से जुड़े प्रश्न ही लगाए जाएं, निजी मामलों से संबंधित प्रश्नों से बचा जाए।

विधायक पूछ रहे ‘तुच्छ’ विषय आखिर कौन से हैं

दिशा-निर्देशों में एक शब्द ने खासतौर पर विधायकों को उलझन में डाल दिया है। सर्कुलर में कहा गया है कि विधायक प्रश्नकाल में ‘तुच्छ विषयों’ से संबंधित प्रश्न न पूछें। हालांकि, तुच्छ विषय की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है।

ऐसे में कई विधायक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि किन मुद्दों को तुच्छ माना जाएगा और किन्हें नहीं। इसी भ्रम के चलते कुछ विधायक विधानसभा सचिवालय के अधिकारियों और कर्मचारियों से भी इस शब्द का आशय समझने के लिए संपर्क कर चुके हैं।

लोकसभा में आजादी, विधानसभा में सीमाएं

विधायकों के बीच यह सवाल भी चर्चा में है कि लोकसभा में सांसद किसी भी राज्य से जुड़ा, राष्ट्रीय महत्व का प्रश्न पूछ सकता है, जबकि राज्य विधानसभा में विधायकों को अपने ही राज्य या जिले से जुड़े प्रश्न पूछने से रोका जा रहा है। इस तुलना के आधार पर कई विधायक इसे विधानसभा में अपनी भूमिका को सीमित करने के रूप में देख रहे हैं।

मंत्री जवाब दें या न दें, बाध्यता नहीं

सर्कुलर में पर्ची के माध्यम से उठाए जाने वाले मामलों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट कर दी गई है। इसमें कहा गया है कि यदि कोई विधायक पर्ची के जरिए कोई मुद्दा उठाता है तो यह जरूरी नहीं कि संबंधित मंत्री जवाब दे ही। मंत्री की इच्छा पर ही जवाब निर्भर करेगा।

वहीं, ध्यानाकर्षण, विशेष उल्लेख और स्थगन प्रस्तावों पर भी अध्यक्षीय व्यवस्था के तहत ही मंत्री जवाब देंगे। ऐसे में सत्र शुरू होने से पहले ही यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या सदन में विधायकों की आवाज कमजोर हो रही है और मंत्रियों को अपेक्षाकृत अधिक छूट दी जा रही है।